ऐसा क्या करते हैं विजेता? Shiv Khera | Safalta Ki Raah Par | Episode 4

सफलता का क्या राज़ है? क्या सफल लोग अलग काम करते हैं? या वे अलग तरीके से अपने सभी काम करते हैं? ‘सफलता की राह पर’ सीरीज़ के इस वीडियो में विश्वविख्यात मोटिवेशनल स्पीकर शिव खेड़ा जी हमें बता रहे हैं कि विजेता कुछ अलग नहीं करते हैं बल्कि, अलग तरीके से अपने सब काम करते हैं.

Created On: Dec 16, 2019 17:45 IST
Modified On: Jan 7, 2020 10:57 IST

स्वाभाविक रूप से हम अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफल होना चाहते हैं और हर एक प्रतिस्पर्धा में विजयी होना चाहते हैं. लेकिन यह विजयश्री सबका दामन नहीं थामती है और केवल कुछ लोग ही अपने प्रयासों में सफल हो पाते हैं. आखिर ऐसा क्यों है? क्या विजेता लोग कुछ अलग काम करते हैं या फिर, वे अपने प्रत्येक काम को अलग तरीके से करते हैं?.....शिव खेड़ा जी हमें इस वीडियो में विजेताओं के सकारात्कम रवैये के बारे में बताने के साथ-साथ यह भी बता रहे हैं कि विजेता अपने प्रत्येक काम को कुछ अलग अंदाज़ से करते हैं जिस वजह से उन्हें कदम-कदम पर जीत मिलती है. इस वीडियो में खेड़ा जी अभ्यास, आदत और सही अभ्यास के फर्क को भी काफी अच्छे तरीके से हमें समझा रहे हैं. अगर आप भी अपने जीवन में सफलता पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो यह वीडियो जरुर आपको मोटीवेट करेगा और आप विजेताओं का हरेक काम करने का अंदाज़ समझ सकेंगे. 

  • खास हवाला – “जीतने वाले कोई अलग काम नहीं करते, हर एक काम अलग ढंग से करते हैं”

शिव खेड़ा जी इस वीडियो में हमें बता रहे हैं कि, अक्सर लोग उनसे यह पूछते हैं कि, जीतने वाले लोग अलग ढंग से क्या करते हैं? इसका जवाब शिव खेड़ा जी कुछ यूं देते हैं कि जीतने वाले लोग उस काम की आदत बना लेते हैं जो हारने वाले लोग जिंदगी में कभी करना नहीं चाहते हैं. शिव खेड़ा जी अपनी इस बात पर बल देने के लिए इसे एक बार फिर दोहराते हैं.

  • जीतने वाले उस काम को करने की आदत बना लेते हैं जो हारने वाले कभी करना नहीं चाहते

शिव खेड़ा जी हमसे यह पूछते हैं कि, ऐसा कौन-सा काम है जो हारने वाले नहीं करना चाहते हैं? यह वही काम है जो जीतने वाले भी नहीं करना चाहते हैं पर फिर भी वे लोग यह काम करते हैं जैसेकि सुबह जल्दी उठना. न तो हारने वाले लोग सुबह जल्दी उठना चाहते हैं और न ही जीतने वाले लोग सुबह जल्दी उठना चाहते हैं, फिर भी जीतने वाले लोग सुबह रोज़ जल्दी उठते हैं. इसी तरह, हारने वाले लोग मेहनत नहीं करना चाहते और सच तो यह है कि जीतने वाले लोग भी मेहनत नहीं करना चाहते, फिर भी जीतने वाले लोग मेहनत करते हैं. दरअसल जीतने वाले लोग उस काम की आदत बना लेते हैं जो हारने वाले लोग अपनी जिंदगी में कभी करना नहीं चाहते.

  • एक कहावत – “इसकी किस्मत ऐसी है कि मिट्टी को हाथ लगाने पर सोना बन जाती है और इसकी किस्मत इतनी खराब है कि सोने को हाथ लगाने पर मिट्टी बन जाता है”

शिव खेड़ा जी हमें समझा रहे हैं कि अगर हम इस बात को परखें तो हमें इस कहावत में सच्चाई मिलेगी भी और नहीं भी मिलेगी. अपनी इस बात को समझाने के लिए शिव खेड़ा जी आगे कहते हैं कि चाहे हम किसी भी आयु वर्ग के हों, हमें अक्सर अपने माता-पिता की यह बात जरुर याद रहती है कि, ‘बेटा अच्छी आदतें बनाओ, आदतों से ही चरित्र बनता है.’

  • अच्छी आदतें बनाती हैं हमारा चरित्र

वे आगे कहते हैं कि अगर मेरी आदतें अच्छी हैं तो मेरा चरित्र भी अच्छा है, और अगर मेरी आदतें बुरी हैं तो मेरा चरित्र भी बुरा है क्योंकि अक्सर लोगों का 90 फीसदी व्यवहार आदतन होता है. हम अक्सर ऐसा नहीं सोचते हैं, पर यह बिलकुल सच है. इसी तरह, अच्छी आदतें मुश्किल से आती हैं लेकिन हमारे जीवन को आसान बना देती हैं और बुरी आदतें बड़ी आसानी से डल जाती हैं लेकिन हमारे जीवन को मुश्किल बना देती हैं. आदतें चाहे कैसी भी क्यों न हों.....जब तक हम अपनी आदतों को पकड़ते हैं, वे आदतें हमें पकड़ चुकी होती हैं. 

  • सकारात्मक व्यवहार एक आदत बन जाता है

शिव खेड़ा जी अपनी ‘मिट्टी और सोने वाले कहावत’ को फिर आगे बढ़ाते हुए हमें समझाते हैं कि, अक्सर हम कुछ ऐसे लोगों के बारे में बात करते हैं कि, वे (लोग) अगर मिट्टी को हाथ लगायें तो वह सोना बन जाता है, अगर हम उनके जीवन और आदतों को परखें तो हमें एक ख़ास बात पता चलती है कि, सकारात्मक व्यवहार ऐसे लोगों की एक आदत बन चुका होता है और यह बात उनके प्रत्येक काम और लेन-देन में झलकती है. ऐसे लोग अपना प्रत्येक काम ठीक तरीके से करते हैं. उनको हर एक काम ठीक तरीके से करने की आदत हो जाती है. यह सब 90 फीसदी आदतन होता है. ऐसे व्यक्ति की स्वाभाविक प्रतिक्रियाएं बिलकुल ठीक होती हैं.

  • नकारात्मक व्यवहार भी बन जाता है एक आदत

ऐसे लोग, जिन्हें हम कहते हैं कि, इनकी किस्मत खराब है, सोने को हाथ लगाते हैं तो मिट्टी बन जाता है, अगर हम उनके जीवन और प्रत्येक काम का विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि नकारात्मक व्यवहार ऐसे लोगों की एक आदत बन चुका होता है. ऐसे लोग अक्सर जब भी कोई काम करते हैं, गलत करते हैं. ऐसा इसलिए होता है कि उन लोगों की आदत ही गलत होती है.

  • मार्शल आर्ट और स्वाभाविक प्रतिक्रिया  

इस वीडियो में आगे शिव खेड़ा जी मार्शल आर्ट का एक बड़ा ही सशक्त उदाहरण दे रहे हैं. जब कोई बच्चा मार्शल आर्ट सीखता है तो तकरीबन 8 साल में वाइट बेल्ट से लेकर ब्लैक बेल्ट जीतने तक केवल वह ब्लॉक और पंच का ही लगातार अभ्यास करता है. दरअसल, ब्लॉक और पंच मार्शल आर्ट के छात्र की एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया बन जानी चाहिए क्योंकि झगड़े के वक्त अगर स्टूडेंट को ब्लॉक और पंच बारे में सोचना पड़े तो वह जरुर पिट जाएगा. मार्शल आर्ट में माहिर छात्र को कभी ब्लॉक और पंच के वार करने के लिए सोचना नहीं पड़ता, ये वार उनकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया बन जाते हैं.

  • विशेषज्ञ बनने के लिए सही अभ्यास है जरुरी

शिव खेड़ा जी हमें समझा रहे हैं कि, लोग कहते हैं – “अभ्यास आपको निपुण बनाता है”. लेकिन, यह बात काफी हद तक गलत है क्योंकि वास्तव में गलत अभ्यास नहीं बल्कि सही अभ्यास ही हमें विशेषज्ञ बनाता है. कुछ लोग अपनी गलतियों का ही अभ्यास करते रहते हैं और फिर वे गलतियां करने में ही माहिर हो जाते हैं क्योंकि अगर हम किसी काम का गलत अभ्यास करें तो फिर आदतन हम उस काम को गलत ही करने लगेंगे. इसलिए सही अभ्यास और सही प्रशिक्षण पर इतना जोर दिया जाता है.

इस वीडियो में शिव खेड़ा जी फिर एक बार मार्शल आर्ट का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि, शुरु-शुरु में जब वाइट बेल्ट के लिए ट्रेनिंग लेने वाला छात्र बड़ी स्पीड से अपना पंच मारता है तो इंस्ट्रक्टर कहते हैं कि अपना पंच मारने का तरीका पहले ठीक करो और इसकी गति कम करो क्योंकि अगर वह छात्र बड़ी तेज़ गति से गलत पंच मार दे तो उसका अपना हाथ फ्रैक्चर हो जाएगा. अगर छात्र पंच मारने का अपना तरीका ठीक कर लेता है तो बाद में स्पीड धीरे-धीरे अपने आप बढ़ जाती है. लेकिन मार्शल आर्ट में वाइट बेल्ट से ब्लैक बेल्ट हासिल करने तक ये ब्लॉक-पंच की आदत इतनी ज्यादा स्वाभाविक हो जाती है कि फिर किसी से झगड़ा हो जाने पर या अपनी रक्षा के लिए ब्लैक बेल्ट व्यक्ति को सोचना नहीं पड़ता बल्कि स्वाभाविक प्रतिक्रिया के जरिये अपने-आप ही वह ब्लॉक पंच का बिलकुल सही इस्तेमाल करता है.

  • सकारात्मक व्यवहार को अपनी स्वाभाविक प्रतिक्रिया बनाना जरूरी है

आगे शिव खेड़ा जी सशस्त्र बलों का शानदार उदाहरण देते हुए हमें समझाते हैं कि दुनिया भर में हर एक जगह सेना रोज़ाना युद्ध का ऐसे अभ्यास करती हैं जैसेकि आज रात को ही लड़ाई छिड़ जायेगी. सैनिक  अपने पूरे करियर में लगभग 80 फीसदी समय इस जंग के खेल का रोज़-रोज़ अभ्यास करते हैं ताकि युद्ध के समय उन्हें सोचना न पड़े और युद्ध उनकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया बन जाए. अगर वे रोज़ाना अभ्यास न करें तो जब युद्ध होगा तो सशस्त्र बल कैसे मुकाबला कर सकेंगे?? फिर शिव खेड़ा जी अपनी बात पर जोर देकर कहते हैं कि हम लोगों को प्रत्येक सकारात्मक व्यवहार को अपनी स्वाभाविक प्रतिक्रिया जरुर बनाना चाहिए.

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