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भारत का भौतिक विभाजन

भारत में लगभग सभी प्रकार के भौगोलिक उच्चावच पाये जाते हैं| इसका कारण भारत का वृहद विस्तार व तटीय अवस्थिति है| भौगोलिक रूप से भारत को पाँच इकाईयों में बांटा जाता है- उत्तर का पर्वतीय भाग, उत्तरी मैदान, दक्षिणी पठार, तटीय मैदान व द्वीपीय भाग| इन सभी भौगोलिक इकाईयों की निर्माण प्रक्रिया व संरचना अलग-अलग प्रकार की है|
Apr 13, 2016 15:43 IST
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भारत में लगभग सभी प्रकार के भौगोलिक उच्चावच पाये जाते हैं| इसका कारण भारत का वृहद विस्तार व तटीय अवस्थिति है| भौगोलिक रूप से भारत को पाँच इकाईयों में बांटा जाता है:

  • उत्तर का महान पर्वतीय भाग
  • उत्तरी भारतीय मैदान
  • प्रायद्वीपीय पठार
  • तटीय मैदान
  • द्वीप

भारत के प्रशासनिक विभाजन के बारे मैं जानने के लिए क्लिक करें:

भारत का प्रशासनिक विभाजन

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ImageSource: image.slidesharecdn.com

उत्तर का महान पर्वतीय भाग

उत्तर के महान पर्वतीय भाग को दो भागों में बांटा जाता है-

1. ट्रांस हिमालय

2. हिमालय

ट्रांस हिमालय पर्वतीय भाग हिमालय के उत्तर में स्थित है, जिसमें काराकोरम, लद्दाख और जास्कर पर्वत श्रेणियाँ शामिल हैं| इस पर्वतीय क्षेत्र की चौड़ाई 150 किमी. से 400 किमी. के बीच पायी जाती है| विश्व की दूसरी सबसे ऊँची चोटी, K-2 (गॉडविन आस्टिन) सहित कुछ अन्य सबसे ऊँची पर्वत चोटियाँ पायी जाती हैं| काराकोरम में बाल्टोरो और सियाचिन जैसे वृहद ग्लेशियर पाये जाते हैं|

सिंधु नदी से लेकर दिहांग या सिंधु नदी तक के पर्वतीय भाग को हिमालय श्रंखला कहा जाता है| हिमालय का अर्थ होता है- ‘हिम का घर’| हिमालय पर्वत श्रंखला का निर्माण तृतीयक कल्प/टर्शियरी युग में अवसादों के मुड़ने से वलित पर्वतों के रूप में हुआ है| प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के अनुसार हिमालय का निर्माण भारतीय प्लेट और यूरोपीय प्लेट के आपस में टकराने और संभवतः भारतीय प्लेट के यूरोपीय प्लेट के नीचे धँसने के कारण अवसादों के मुड़ने से हुआ है| इसीलिए हिमालय को ‘नवीन वलित पर्वत श्रंखला’ कहा जाता है|

हिमालय में उत्तर से दक्षिण तीन समानान्तर पर्वत श्रेणियाँ पायी जाती हैं, जिनकी ऊँचाई दक्षिण से उत्तर की ओर क्रमशः बढ़ती जाती है| इन श्रेणियों के नाम हैं:

1. ‘वृहत हिमालय’ या ‘हिमाद्रि’

2. ‘मध्य हिमालय’ ‘हिमाचल’ या ‘लघु हिमालय’

3. ‘शिवालिक’

हिमालय की सबसे उत्तरी श्रेणी को ‘वृहत हिमालय या हिमाद्रि के नाम से जानते हैं| यह हिमालय की सबसे ऊँची श्रेणी है, जिसकी औसत ऊँचाई 6000 मी. है| इसी श्रेणी में भारत की सर्वोच्च चोटी ‘कंचनजुंगा’ (सिक्किम) स्थित है और इसी श्रेणी में नेपाल में विश्व की सबसे ऊँची पर्वत चोटी ‘एवरेस्ट’ (8,848 मी.) स्थित है|

वृहद हिमालय श्रेणी के दक्षिण में स्थित हिमालयी पर्वत श्रेणी को मध्य हिमालय’, हिमाचल या लघु हिमालय कहा जाता है| इसकी औसत ऊँचाई 4000-4500 मी. है| डलहौजी, शिमला, धर्मशाला, मसूरी जैसे पर्वतीय पर्यटक स्थल इसी श्रेणी में स्थित हैं|इनकी ढालों पर वन व घास के मैदान पाये जाते हैं|इसकी औसत चौड़ाई लगभग 80 किमी. है|

लघु हिमालय के दक्षिण में हिमालय की सबसे दक्षिणी श्रेणी को ‘शिवालिक कहा जाता है| यह हिमालय की सबसे निचली पर्वत श्रेणी है, जिसकी औसत ऊँचाई 1200-1500 मी. के बीच है| इस श्रेणी का निर्माण अवसादी चट्टानों, असंगठित पत्थरों व सिल्ट से हुआ है|यह पश्चिम से पूर्व तक लगातार विस्तृत न होकर पूर्व में अन्य श्रेणियों से मिल जाती है| इसकी चौड़ाई 10-50 किमी. के बीच पायी जाती है| इस श्रेणी में पायी जाने वाली कुछ संकरी घाटियों को ‘दून कहा जाता है, जैसे-देहारादून इसी तरह की एक घाटी में स्थित शहर है|

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ImageSource: www.oerafrica.org

म्यांमार की सीमा के सहारे विस्तृत हिमालय के पूर्वी विस्तार को पूर्वान्चल की पहाड़ियाँ कहा जाता है| पूर्वान्चल में पटकई बूम, गारो-ख़ासी-जयंतिया, लुशाई हिल्स, नागा हिल्स और मिज़ो हिल्स जैसी हिल्स शामिल हैं|

उत्तरी भारतीय मैदान

उत्तर के महान पर्वतीय भाग के दक्षिण में ‘उत्तरी भारतीय मैदान’ पाया जाता है| हिमालय के निर्माण के समय शिवालिक के दक्षिण में एक खाई का निर्माण हो गया था, जिसमें गंगा और ब्रह्मपुत्र की नदियों द्वारा लाये गए अवसादों के निक्षेपण से भारत के उत्तरी मैदान का निर्माण हुआ है| यह मैदान पश्चिम में सतलज नदी से लेकर पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी तक लगभग 2500 किमी. की लंबाई में फैला हुआ है| इसका निर्माण नदी द्वारा लाये गए जलोढ़ से हुआ है, इसीलिए यह भारत के सर्वाधिक उपजाऊ क्षेत्र हैं| इस मैदान की पुरानी जलोढ़ को ‘बांगर कहा जाता है और नवीन जलोढ़ को ‘खादर कहा जाता है| पश्चिम से पूर्व की ओर इस मैदान की चौड़ाई कम होती जाती है| भारत के उत्तरी मैदान को वृहद रूप से निम्नलिखित दो उप-भागों में बांटा जाता है:

1. गंगा का मैदान

2. ब्रह्मपुत्र का मैदान

यह दोनों मैदान एक सँकरे भाग द्वारा आपस में जुड़े हुए हैं|

प्रायद्वीपीय पठार

उत्तर भारतीय मैदान के दक्षिण में प्रायद्वीपीय पठार स्थित है, जोकि भारत का सर्वाधिक प्राचीन भाग है| भारत का प्रायद्वीपीय पठार प्राचीन गोंडवानालैंड का हिस्सा है, जो गोंडवानालैंड के विभाजन के बाद उत्तर की ओर खिसककर अपने वर्तमान स्वरूप में आ गया है| इसका निर्माण प्राचीन व कठोर आग्नेय चट्टानों से हुआ है|

प्रायद्वीपीय पठार को वृहद रूप से दो मुख्य भागों में बांटा जाता है:

1. मध्य उच्चभूमि

2. दक्कन का पठार

विंध्य पर्वतों के उत्तर में स्थित प्रायद्वीप के उत्तरी भाग को ‘मध्य उच्चभूमि’ के नाम से जाना जाता है| यह उत्तर-पश्चिम में अरावली पर्वत, उत्तर में गंगा के मैदान से घिरा हुआ है| मध्य उच्चभूमि को भी पश्चिम से पूर्व विभिन्न पठारों में बांटा गया है:

मध्य उच्चभूमि के पश्चिमी भाग को ‘मालवा पठार के नाम से जाना जाता है तथा पूर्वी भाग को ‘छोटानागपुर के पठार’ के नाम से जाना जाता है और इन दोनों के मध्य में ‘बुंदेलखंड व ‘बघेलखंड का पठार पाया जाता है|

दक्कन के पठार का विस्तार उत्तर में विंध्य पर्वत से लेकर प्रायद्वीप के दक्षिणी सिरे तक है| यह पश्चिम में ‘पश्चिमी घाट और पूर्व में ‘पूर्वी घाट से घिरा हुआ है| पूर्वी घाट की तुलना में पश्चिमी घाट अधिक सतत व ऊँचा है| पश्चिमी घाट में सहयाद्रि, नीलगिरी, अन्नामलाई व कार्डमम पहाड़ियाँ शामिल हैं| पश्चिमी घाट की ऊँचाई उत्तर से दक्षिण की ओर बढ़ती जाती है| भारतीय प्रायद्वीप की सबसे ऊँची चोटी ‘अन्नामलाई है, जिसकी ऊँचाई 2695 मी. है|

दक्कन के पठार का उत्तर-पश्चिमी भाग लावा प्रवाह से बना हुआ है, जिसे ‘दक्कन ट्रेप कहते हैं| उत्तर की ओर प्रवाहित होने के दौरान प्रायद्वीपीय पठार पर दरारी ज्वालामुखी की क्रिया हुई और दक्कन ट्रेप का निर्माण हुआ| दक्कन ट्रेप लगभग सम्पूर्ण महाराष्ट्र तथा गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश के कुछ भागों में पाया जाता है|

प्रायद्वीपीय पठार की अधिकांध नदियां, जैसे-गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि पूर्व की ओर बहती हुई बंगाल की खाड़ी में जाकर गिरती हैं, लेकिन नर्मदा व तापी जैसी प्रायद्वीपीय नदियां पश्चिम की ओर बहती हुई अरब सागर में जाकर गिरती हैं|

तटीय मैदान

दक्कन का पठार दोनों ओर से तटीय मैदानों से घिरा हुआ है| पश्चिमी तटीय मैदान गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक व केरल राज्यों के सहारे विस्तृत है| पश्चिमी तटीय मैदान उत्तर में सर्वाधिक चौड़ा है और दक्षिण की ओर जाने पर यह संकरा होता जाता है| महाराष्ट्र के तटीय मैदान को ‘कोंकण तट कहा जाता है और केरल के तटीय मैदान को ‘मालाबार तट कहा जाता है| पश्चिमी तटीय मैदान में नर्मदा व तापी नदियों के ज्वारनदमुख, केरल की लैगून झीलें पायी जाती हैं|

पूर्वी तटीय मैदान पश्चिमी तट की तुलना में अधिक चौड़ा व समतल है, जो अनेक बड़ी-बड़ी प्रायद्वीपीय नदियों के डेल्टाओं के द्वारा विच्छेदित हो गया है| उत्तर में यह मैदान गंगा-ब्रह्मपुत्र के मैदान से जाकर मिल जाता है| पूर्वी तट के उत्तरी तटीय मैदान को ‘उत्तरी सरकार व दक्षिण में तमिलनाडु के सहारे विस्तृत तटीय मैदान को कोरोमंडल तट कहा जाता है|

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ImageSource: targeticse.co.in

द्वीप

केरल तट के पश्चिम में अनेक छोटे-छोटे द्वीप पाये जाते हैं, जिन्हें सम्मिलित रूप से ‘लक्षद्वीप कहा जाता है| इन द्वीपों की उत्पत्ति स्थानीय आधार पर हुई है और इनमें से अधिकांश प्रवाल द्वीप हैं| बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीपों को सम्मिलित रूप से ‘अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह कहा जाता है| ये द्वीप आकार में बड़े होने के साथ-साथ संख्या में भी अधिक हैं| इनमें से कुछ द्वीपों की उत्पत्ति ज्वालामुखी क्रिया से हुई है,जबकि अन्य द्वीपों का निर्माण पर्वतीय चोटियों के सागरीय जल में डूबने से हुआ है| भारत का सबसे दक्षिणी बिंदु, जिसे इन्दिरा प्वाइंट कहा जाता है और जो 2005 में आई सूनामी के कारण डूब गया था, ग्रेट निकोबार द्वीप में स्थित है|