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मौर्य साम्राज्य: प्रशासन

शाही राजधानी पाटलिपुत्र के साथ मौर्य साम्राज्य चार प्रांतों में विभाजित था। अशोक के शिलालेखों से प्राप्त चार प्रांतीय राजधानियों के नाम, तोसली (पूर्व में), उज्जैन (पश्चिम में), स्वर्णागिरी (दक्षिण में) और तक्षशिला (उत्तर में) थे। संरचना के केंद्र में कानून बनाने की शक्ति राजा के पास होती थी। जब वर्णों और आश्रमों पर आधारित सामाजिक व्यवस्था (जीवन चक्र) समाप्त होती थी तो तब कौटिल्य राजा को धर्म का प्रचार करने की सलाह देता था।
Aug 31, 2015 12:54 IST
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पाटलिपुत्र की शाही राजधानी के साथ मौर्य साम्राज्य चार प्रांतों में विभाजित था। अशोक के शिलालेखों से प्राप्त  चार प्रांतीय राजधानियों के नाम, तोसली (पूर्व में), उज्जैन (पश्चिम), स्वर्णागिरी (दक्षिण में) और तक्षशिला (उत्तर में) थे। मेगस्थनीज के अनुसार, साम्राज्य के प्रयोग के लिए 600,000 पैदल सेना, 30,000 घुड़सवार सेना, और 9000 युद्ध हाथियों की समारिक सेना थी। आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के उद्देश्य के लिए एक विशाल जासूस प्रणाली थी जो अधिकारियों और दूतों पर नजर रखती थी। राजा ने चरवाहों, किसानों, व्यापारियों और कारीगरों आदि से कर लेने के लिए अधिकारियों को नियुक्त किया था। राजा प्रशासनिक अधिरचना का केंद्र होता था और मंत्रियों और उच्च अधिकारियों की नियुक्ति राजा करता था। प्रशासनिक ढांचा इस प्रकार था:

राजा को मंत्रीपरिषद (मंत्रियों की परिषद) द्वारा सहायता प्राप्त होती थी जिसके सदस्यों में अध्यक्ष और निम्नांकित सदस्य शामिल होते थे:

युवराज: युवराज

पुरोहित: मुख्य पुजारी

सेनापति: प्रमुख कमांडर

आमात्य: सिविल सेवक और कुछ अन्य मंत्रीगण।

विद्वानों द्वारा दिये गये सुझावों के बाद मौर्य साम्राज्य को आगे चलकर महत्वपूर्ण अधिकारियों के साथ विभिन्न विभागों में विभाजित कर दिया गया था:

राजस्व विभाग: - महत्वपूर्ण अधिकारीगण: सन्निधाता: मुख्य कोषागार, समहर्थ: राजस्व संग्राहक मुखिया

सैन्य विभाग: मेगस्थनीस ने सैन्य गतिविधियों के समन्वय के लिए इन छह उप समितियों के साथ एक समिति का उल्लेख किया है। पहले का काम नौसेना की देखभाल करना, दूसरे का काम परिवहन और प्रावधानों की देखरेख करना था, तीसरे के पास पैदल सैनिकों, चौथे के पास घोडों, पांचवे के पास रथों और छठे के पास हाथियों के देखरेख की जिम्मेदारी थी।

जासूसी विभाग: महामात्यपासारपा गुधापुरूषों को नियंत्रित करता था  (गुप्त एजेंट)

पुलिस विभाग: जेल को बंदीगृह के रूप में जाना जाता था और लॉक से भिन्न थी जिसे चरका कहा जाता था। यह सभी प्रमुख केंद्रों के पुलिस मुख्यालयों में होती थी।

प्रांतीय और स्थानीय प्रशासन: प्रादेशिका: आधुनिक जिला मजिस्ट्रेट, स्थानिका: प्रादेशिका के तहत कर संग्रह अधिकारी, दुर्गापाला: किले के गवर्नर, अकक्षापताला: महालेखाकार, लिपीकार: लेखक, गोप: लेखाकार आदि के लिए जिम्मेदार था।

नगर प्रशासन: महत्वपूर्ण अधिकारीगण: नगारका: शहर प्रशासन का प्रभारी, सीता- अध्यक्ष: कृषि पर्यवेक्षक, सामस्थ-अध्यक्ष: बाजार अधीक्षक, नवाध्यक्ष: जहाजों के अधीक्षक, शुल्काध्यक्ष: पथ-कर के अधीक्षक, लोहाध्यक्ष: लोहे के अधीक्षक, अकाराध्यक्ष: खानों के अधीक्षक, पौथवाध्यक्ष: वजन और माप आदि के अधीक्षक।

मेगस्थनीस ने छ समितियों का उल्लेख किया है जिसमें पांच पाटलिपुत्र का प्रशासनिक देखभाल करती थी। उद्योगों, विदेशियों,  जन्म और मृत्यु का पंजीकरण, व्यापार,  निर्माण और माल की बिक्री और बिक्री कर का संग्रह प्रशासन के नियंत्रण में था।