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दिल्ली सल्तनत के अंतर्गत इल्बरी वंश का संक्षिप्त विवरण

इल्बरी वंश दिल्ली सल्तनत का पहला वंश थाl विभिन्न इतिहासकारों ने इसे गुलाम वंश या मामलूक वंश के रूप में भी नामित किया हैl इस लेख में हम दिल्ली सल्तनत के अंतर्गत इल्बरी वंश का संक्षिप्त विवरण दे रहे हैं, जिसका उपयोग विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले उम्मीदवार अपनी तैयारी के पुनरीक्षण के लिए कर सकते हैंl
May 9, 2017 17:00 IST
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इल्बरी वंश दिल्ली सल्तनत का पहला वंश थाl विभिन्न इतिहासकारों ने इसे गुलाम वंश या मामलूक राजवंश के रूप में भी नामित किया हैl लेकिन इस राजवंश को गुलाम वंश कहना गलत है, क्योंकि इस वंश के नौ शासकों में से केवल तीन कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश और बलबन अपने शुरूआती जीवन में गुलाम थे और बाद में उनके स्वामी ने उनकी असीम शक्तियों को देखते हुए दासत्व से मुक्त कर दिया थाl मामलूक शब्द का अर्थ है “स्वतंत्र अभिभावकों से पैदा हुए दास" लेकिन उस समय दासता का अर्थ यह नहीं थाl इसलिए इस वंश के लिए इल्बरी शब्द सबसे अधिक मान्यता प्राप्त है, क्योंकि कुतुबुद्दीन ऐबक को छोड़कर इस वंश के सभी शासक तुर्कों के इल्बरी जनजाति के थेl इस लेख में हम दिल्ली सल्तनत के अंतर्गत इल्बरी वंश का संक्षिप्त विवरण दे रहे हैं, जिसका उपयोग विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले उम्मीदवार अपनी तैयारी के पुनरीक्षण के लिए कर सकते हैंl

Ilbari Dynasty

दिल्ली सल्तनत के अंतर्गत इल्बरी वंश का संक्षिप्त विवरण

इल्बरी वंश की स्थापना कुतुबुद्दीन ऐबक के द्वारा की गई थी, जो मुहम्मद गोरी का दास और उसकी सेना का सेनापति थाl 1206 में कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा संप्रभु शक्तियों की प्राप्ति को दिल्ली सल्तनत और सल्तनत के पहले वंश की स्थापना के रूप में जाना जाता हैl

कुतुबुद्दीन ऐबक (1206-1210)

1. उसने शुरूआत में लाहौर को और बाद में दिल्ली को अपनी राजधानी बनायाl

2. वह भारत का पहला मुस्लिम शासक और इल्बरी वंश का संस्थापक थाl

3. मूल रूप से वह एक तुर्क दास था जिसे मुहम्मद गोरी ने खरीदा था और वह धीरे-धीरे अपनी सैन्य क्षमता के कारण उसका विश्वसनीय सेनापति बन गया थाl कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1206 में सत्ता संभाली थीl

4. चार सालों के अपने संक्षिप्त शासन के दौरान वह किसी विजय अभियान पर नहीं गया, क्योंकि उसका पूरा ध्यान कानून-व्यवस्था की स्थापना और सेना को मजबूत बनाने के लिए समर्पित थाl

5. 1210 ईस्वी में लाहौर में चौगान (पोलो) खेलते समय वह अपने घोड़े से गिर गया था और चोटों की वजह से उसकी मृत्यु हो गई थीl

6. कुतुबुद्दीन एक महान वास्तुकला प्रेमी थाl उसने कूव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद (दिल्ली) और अढ़ाई दिन का झोपड़ा (अजमेर में एक मस्जिद) का निर्माण करवाया था, जबकि कुतुब  मीनार का निर्माणकार्य शुरू करवाया थाl कुतुब मीनार की ऊंचाई 72  मीटर (238 फीट) है और इसे मुस्लिम संत “ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी” की याद में दिल्ली में बनाया गया हैl कुतुब मीनार का निर्माणकार्य कुतुबुद्दीन ऐबक के उत्तराधिकारी इल्तुतमिश के द्वारा पूरा किया गया थाl

7. अपनी उदारता के कारण वह “लाख बख्श” या “लाखों का दाता” के नाम से जाना जाता थाl

8. ऐबक हसन निजामी और फखरूद्दीन जैसे लेखकों का संरक्षक थाl हसन निजामी की रचना “ताजूल मासीर” मुख्यतः ऐबक से संबंधित हैl

शम्सुद्दीन इल्तुतमिश (1211-1236 ईस्वी)

वह कुतुबुद्दीन ऐबक का गुलाम था। उसकी वास्तविक क्षमता से प्रभावित होकर कुतुबुद्दीन ने इल्तुतमिश को पहले अपना दामाद और बाद में बदायूं का गवर्नर बनाया थाl 1211 ईस्वी में इल्तुतमिश ने कुतुबुद्दीन के उत्तराधिकारी आरामशाह को गद्दी से हटाकर खुद शासक बन गयाl उसने लगभग एक चौथाई सदी तक शासन कियाl इल्तुतमिश एक योग्य शासक साबित हुआ एवं उसने ऐबक द्वारा शुरू किए गए कामों को पूरा कियाl

 Iltutmish

1. उसने उपरोक्त वर्णित समस्याओं का बहुत व्यवहारिक ढंग से सामना कियाl 1226-1234 ईस्वी के बीच के आठ साल में, उसने रणथम्भौर (1226), मंडावर (1227), बयाना, जालौर, ग्वालियर, मालवा, भिलसा, उज्जैन और बंगाल (1231) को जीत लिया थाl

2. उसने तराईन की लड़ाई (1217) में एल्दौज को हराया और उसकी हत्या कर दीl इसी तरह 1228 में उसने कुबाचा के खिलाफ सैन्य अभियान चलाया और उसकी हत्या कर दीl

3. इल्तुतमिश के शासनकाल की एक उल्लेखनीय घटना यह है कि पहली बार मंगोल आक्रमणकारी भारत की सीमा तक पहुंचे थे। 1221 ईस्वी में मंगोल प्रमुख “चंगेज खान” (दुनिया का सबसे शक्तिशाली विजयप्राप्तकर्ताओं में से एक) अपने दुश्मन जलालुद्दीन (ख्वारिज्म या खीव के राजा) का पीछा करते हुए सिन्धु नदी तक पहुंच गया थाl  उस समय इल्तुतमिश ने जलालुद्दीन को आश्रय देने से इनकार करते हुए सल्तनत की रक्षा की थीl

4. उसने अपने विजय अभियानों से अपने साम्राज्य को संगठित किया और उत्तर भारत में अपने शासन को मजबूत किया तथा उज्जैन तक मुस्लिम शासन का विस्तार कियाl

5. इल्तुतमिश ने देश को एक राजधानी, एक संप्रभु राज्य, सरकार का राजशाही रूप और एक शासक वर्ग या अमीर (जिसे “तुर्कान-ए-चिहलगानी” या “चालीसा” (चालीस का समूह)) दियाl उस समय “तुर्कान-ए-चिहलगानी” शासकों का अभिजात वर्ग थाl

6. उसने अपने साम्राज्य को कई बड़े और छोटे इक्ताओं में विभाजित किया था और कर्मचारियों को वेतन के बदले भूमि देता था, जिसे उसने अपने तुर्क अधिकारियों में वितरित कियाl

7. उसने इक्ताओं का इस्तेमाल प्रशासन को केन्द्रीयकृत करने और सामंती व्यवस्था को समाप्त करने के लिए कियाl

8. उसने नागरिक प्रशासन और सेना में सुधार की शुरूआत की जिसके तहत केन्द्र के द्वारा भुगतान की प्रक्रिया की शुरूआत हुईl

9. वह पहला सुल्तान था जिसने गंगा-यमुना के बीच के दोआब क्षेत्र के आर्थिक महत्व को समझाl

10. उसने व्यापार और वाणिज्य को सुविधाजनक बनाने के लिए चांदी (टंका) और तांबे (जीतल) के सिक्के जारी किए। ये सिक्के दिल्ली से जारी किए गए पहले शुद्ध अरबी सिक्के थेl

11. उसे दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक माना जाता हैl

रजिया बेगम (1236-1240)

वह इल्तुतमिश की बेटी थी, जिसे इल्तुतमिश ने उत्तराधिकारी के रूप में नामित किया थाl जबकि “तुर्कान-ए-चिहलगानी” के सदस्यों ने एक अक्षम राजकुमार रूकनुद्दीन फिरोज को इल्तुतमिश के उत्तराधिकारी के रूप में चुना थाl रजिया अपनी प्रतिभा और लोगों के बीच लोकप्रियता के आधार पर भारत की पहली महिला सुल्तान बनीl

1. यह पहला वाकया था जब दिल्ली के लोगों ने शाही उत्तराधिकार के मामले में भाग लिया थाl

2. रजिया ने “पर्दा” प्रथा का त्याग कर दिया थाl वह पुरूषों की तरह पोशाक पहनकर दरबार में आती थी और स्वंय ही सेना का नेतृत्व करती थीl

3. उसने वजीर “निजाम-उल-मुल्क जुनैदी” को हराया था, जिसने उसकी उन्नति का विरोध किया था और रणथंभौर पर विजय प्राप्त की थीl

4. उसने एक शक्तिशाली शासन व्यवस्था स्थापित करने की कोशिश की थी, लेकिन अपने प्रति वफादार रईसों की पार्टी बनाने और एक गैर-तुर्क (अबसीनिया का अमीर) “जलालुद्दीन याकुत” को उच्च पद पर नियुक्त करने के कारण लोग उसके विरोधी हो गएl

5. इन कारणों से लाहौर के गवर्नर (कबीर खान) और भटिंडा के गवर्नर (अल्तुनिया) ने विद्रोह कर दियाl रजिया ने स्वंय ही लाहौर के खिलाफ अभियान का नेतृत्व किया और विद्रोह को दबा दियाl

6. लाहौर से दिल्ली वापस आने के क्रम में “तबरहिंद” के पास याकूत की हत्या कर दी गई और रजिया को बंदी बना लिया गया थाl

7. इसके बाद रजिया ने अल्तुनिया से शादी कर ली, लेकिन एक षड्यंत्र के तहत 1240 ईस्वी में कैथल के पास रजिया और उसके पति की हत्या कर दी गई थीl

8. समकालीन इतिहासकार “मिनहाज-उस-सिराज” स्वीकार करते हैं कि रजिया में एक महान शासक बनने के सारे गुण मौजूद थे, लेकिन उसकी केवल एक कमजोरी यह थी कि वह एक महिला थीl रजिया के शासनकाल को राजशाही और तुर्क प्रमुखों (“चालीस” या “चिहलगानी”) के बीच सत्ता के लिए संघर्ष की शुरूआत के लिए याद किया जाता हैl

9. रजिया के बाद कुछ ही समय के अंतराल में उसका भाई बहराम और उसका भतीजा अलाउद्दीन मसूद सिंहासन पर आसीन हुए, लेकिन उन दोनों को अक्षमता के कारण सत्ता से हटा दिया गया और अंततः “नासिरूद्दीन मुहम्मद” दिल्ली की गद्दी पर बैठाl

नासिरूद्दीन मुहम्मद (1246-1266)

नासिरूद्दीन मुहम्मद इल्तुतमिश का पुत्र थाl वह बहुत ही सुशील, अध्ययनशील और धार्मिक प्रवृति का व्यक्ति था और उसकी सरल आदतों के कारण इतिहास में उसे “दरवेश राजा” के नाम से जाना जाता हैl उसने अपने स्वयं के इस्तेमाल के लिए राज्य के खजाने से एक भी पैसा नहीं लेता था और पवित्र कुरान की प्रतियां लिखकर और उन्हें बेचकर अपना जीवन यापन व्यतीत करता थाl

1. राजशाही और चिहलगानी के बीच संघर्ष में तुर्कों का प्रमुख बलबन राज्य का असली शासक बन गया थाl

2. उसने अपनी एक बेटी की शादी सुल्तान से करवा दी थी, जिससे राजदरबार में उसकी स्थिति और भी मजबूत हो गई थीl

3. बलबन को “नाइब-ए-मामलाकत” (उपाध्यक्ष) का पद सौंपा गया था और “उलूघ खान” का खिताब दिया गया थाl

4. मंगोल आक्रमण के समय “इमादुद्दीन रिहान” के स्थान पर बलबन को “वजीर” का पद दिया गया थाl उसने बीस साल तक सुल्तान की सेवा की और साम्राज्य को बरकरार रखाl 1266 में सुल्तान “नासिरूद्दीन मुहम्मद” की मृत्यु के बाद बलबन दिल्ली के सिंहासन पर आसीन हुआl

5. फतुहात-ए-सलातिन के लेखक इजामी और इब्नेबतुता जैसे इतिहासकारों के अनुसार बलबन ने सुल्तान की हत्या की थीl

सल्तनतकाल में इस्तेमाल होने वाले प्रशासनिक और कृषि से जुड़े शब्दों की सूची

गयासुद्दीन बलबन (1266-1287)

बलबन एक इल्बरी-तुर्क था और उसका मूल नाम बहाउद्दीन था। वह इल्तुतमिश का दास था  और धीरे-धीरे उसने सुल्तान के सिंहासन पर कब्जा कर लियाl

Balban

1. “तुर्कान-ए-चिहलगानी” की शक्ति को नष्ट करने के लिए और राजशाही की प्रतिष्ठा और शक्ति को बढ़ाने के लिए उसने शासन के एक नए सिद्धांत को स्थापित कियाl

2. उसने नीच मुस्लिम कुल में पैदा हुए “कमाल अमाया” को ख्वाजा के पद पर नियुक्त करने से इनकार कर दियाl उसने न्याय प्रक्रिया को अत्यंत निष्पक्षता के साथ लागू किया और यहां तक कि अपने चचेरे भाई “शेर खान” की शक्तियों को समाप्त करने के लिए उसे जहर दे दियाl उसने अदालती कार्यवाही को नियमित करने के लिए “अमीर-ए-हाजीब” नामक अधिकारी को नियुक्त किया थाl

3. बलबन के शासन का सिद्धांत शक्ति, प्रतिष्ठा और न्याय पर आधारित थाl उसके अनुसार शासन के लिए अनिवार्य तीन तत्व सेना, राजकोष और अमीर (nobles) थे और सफलता के साधन न्याय, लाभप्रदता, वैभव और दिखावा थाl

4. उसने मंगोलों के खिलाफ दो आयामी रणनीति को अपनायाl सबसे पहले उसने मंगोल दरबार से दूतावासों का आदान-प्रदान कियाl इसके बाद उसने दो रक्षा लाइनें बनाईl पहली लाइन लाहौर, मुल्तान और दीपालपुर के क्षेत्र से गुजरती थी जिसका नेतृत्व राजकुमार “मुहम्मद” के हाथों में थाl दूसरी लाइन सुनाम, समाना और भटिंडा के क्षेत्र से गुजरती थी जिसका नेतृत्व बलबन के सबसे छोटे बेटे राजकुमार “बुगरा खान” के हाथों में थाl

5. दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्र में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ गई थीl मेवाती राजपूतों ने देश में लूट-पाट मचा रखी थी, जिसके कारण दोआब क्षेत्र में जीवन, संपत्ति और व्यापार असुरक्षित हो गए थेl

6. इन तत्वों से निपटने के लिए बलबान ने लौह एवं रक्त की नीति अपनायी। उसने दोआब क्षेत्र में जंगलों को कटवाकर कई किलों का निर्माण करवायाl इन किलों की रक्षा के लिए भाड़े के अफगान सैनिकों को नियुक्त किया गया थाl गोपालगिर के किले ने शहर के दक्षिण-पश्चिमी प्रवेश द्वार की रक्षा की थीl

7. बलबन के शासनकाल की सबसे महत्वपूर्ण घटना बंगाल विद्रोह का दमन थाl बंगाल के गवर्नर “तुघरील खान” ने अपनी आजादी को इस धारणा के तहत घोषित किया कि “राजा बहुत बूढ़ा” हो गया है और उसका प्रांत दिल्ली से बहुत दूर हैl इसके अलावा उसने अपने खिलाफ भेजे गए दो शाही सेनाओं को भी हरा दिया थाl

8. आखिर में बलबन खुद “बुगरा खान” के साथ बंगाल की ओर चला। बलबन की आने की खबर सुनकर “तुघरील खान” अपनी राजधानी “लखनौती” को छोड़कर “जाजनगर (उड़ीसा)” के जंगल में भाग गया, लेकिन अंततः उसे पकड़ लिया गया और पूरे परिवार के साथ उसकी हत्या कर दी गईl इसके बाद बलबन ने अपने बेटे “बुगरा खान” को बंगाल के गवर्नर के रूप में नियुक्त कियाl

9. राजशाही को मजबूत करने के लिए बलबन ने केन्द्रीय सैन्य विभाग “दीवान-ए-अर्ज” का पुनर्गठन कियाl इक्ता की आय के बेहतर पर्यवेक्षण के लिए उसने इक्ता में एक नए अधिकारी “ख्वाजा” को नियुक्त किया थाl

10. इसी तरह उसने “बरिद-ए-मुमालिक” नामक अधिकारी के अंतर्गत जासूसी विभाग को संगठित किया थाl इस तरह एक मजबूत और केन्द्रीयकृत सरकार के युग की शुरूआत हुई थीl

11. 1285 ईस्वी में मंगोल नेता “तामर” के खिलाफ एक लड़ाई में राजकुमार मुहम्मद की मृत्यु हो गई थीl अपने प्रिय पुत्र की मृत्यु सुल्तान के लिए भयानक सदमा साबित हुआ था और 1287 ईस्वी में दिल्ली में उसकी मृत्यु हो गई थीl उसे दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संगठनकर्ता माना जाता हैl

कैकूबाद (1287-1290 ईस्वी)

1. वह बलबान का पोता और बुगरा खान (बंगाल का गवर्नर) का पुत्र थाl

2. वह बहुत ही आलसी और भोग-विलासी प्रवृति का व्यक्ति थाl

3. 1290 में पंजाब के गवर्नर फिरोजशाह ने उसकी हत्या कर दी और जलालुद्दीन खिलजी के नाम से शासक बनाl इस प्रकार दिल्ली में खिलजी राजवंश की शुरूआत हुईl

दिल्ली सल्तनत की समय-सीमा और कालक्रम