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सरकारी नौकरी पाने के इच्छुक उम्मीदवार जानें भारत में सरकारी नौकरियों से जुड़े 4 मिथक और तथ्य

Aug 24, 2016 15:16 IST
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हाल ही में महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा कुलियों और सफाई कर्मचारियों हेतु जारी की गई अधिसूचनाओं के तहत स्नातकोत्तर और पीएचडी धारक आवेदकों ने अपने आवेदन पत्र जमा किये थे. उच्च शिक्षा प्राप्त आवेदकों द्वारा चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी की नौकरी हेतु आवेदन करना वस्तुतः भारत के उच्च मध्यम वर्गीय, मध्यम वर्गीय और निम्न वर्गीय परिवार में सरकारी नौकरी के महत्व तथा उनकी लालसा को दर्शाता है.

अधिकांश अभ्यर्थी किसी न किसी सरकारी निकाय में ही नौकरी करना चाहते हैं. निजी क्षेत्र के आकर्षक पैकेज के बावजूद भी अधिकांश अभ्यर्थियों की इच्छा सरकारी नौकरी पाने की होती है. यहाँ तक कि अभ्यर्थी अंतिम विकल्प के रूप में ही निजी क्षेत्र की नौकरियों को रखते हैं.

आगामी कुछ वर्षो में रोजगार बाजार के परिप्रेक्ष्य में सरकारी नौकरियों की मांग में गुणात्मक वृद्धि हुई है. वस्तुतः सरकारी नौकरी से जुड़े कुछ ऐसे मिथक हमारे समाज में विद्यमान हैं जिसके कारण सहज ही अभ्यर्थी उस ओर आकर्षित होते हैं तथा दिनोंदिन सरकारी नौकरियों की मांग बढ़ती जा रही है और इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का उच्चतम मानदंड स्थापित होता जा रहा है.

दरसल स्थायी नौकरी, निश्चित लक्ष्य का आभाव, बेहतर और समान स्केल पर समान वेतन तथा काम के घंटों के साथ साथ अतिरिक्त भत्ते की प्राप्ति आदि मिथकों के कारण अभ्यर्थी स्वाभाविक रूप से सरकारी नौकरी के प्रति आकर्षित होते हैं.
यदि आप भी सरकारी नौकरी पाने के इक्छुक हैं और इस दिशा में प्रयासरत हैं तो आपको अवश्य ही इन अवधारणाओं की जानकारी होनी चाहिए ताकि आप वास्तविकता से अवगत हो अपनी तैयारी को सही अंजाम दें सकें.

मिथक: सरकारी नौकरी पक्की (स्थायी) होती है.
तथ्य: आजकल कई सरकारी संगठन अनुबंध के आधार पर ही नौकरियां निकालते हैं.ऐसी सरकारी संस्थाएं  अनुबंध के आधार पर ही उम्मीदवारों की भर्ती कर रही हैं. उम्मीदवारों की भर्ती परियोजनाओं में कुछ समय तक या फिर परियोजना की समाप्ति तक काम  करने के लिए की जाती है और ये परियोजनायें अक्सर विशेष समय अवधि की होती हैं. उदाहरण के लिए  यूपीएसआरटीसी ने अभी हाल ही में  एक सौ से अधिक संविदात्मक पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किया था.
सरकारी अधिकारियों के काम-काज को लेकर कई संशोधन लागू किये गए हैं. सरकारी अधिकारियों के काम-काज का मूल्यांकन नियमित रूप से किया जा रहा है ताकि अपना कार्य  न करने वाले अधिकारियों और संदिग्ध विश्वसनीयता  वाले अधिकारीयों की लगातार समीक्षा की जा सके और तदनुरूप कार्रवाई की जा सके.
अतः काम न करने वाले और काम के प्रति कठोर रुख अपनाने वाले सरकारी अधिकारियों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है.

मिथक: सरकारी नौकरियों में 'कोई निश्चित लक्ष्य नहीं' होता है.
तथ्य: यह धारणा सही नहीं है क्यों कि अब सरकारी निकायों ने काम से जी चुराने वाले अधिकारियों के लिए  दरवाजे बंद करने शुरू कर दिए हैं. अपना कर्तव्य विधिवत रूप से निभाने के लिए बाध्य अधिकारी ही प्रोमोशन और अन्य लाभ के भागीदार हो सकते हैं.  
यहां तक कि कई सरकारी निकाय अपना काम समय पर निपटाने के लिए निजी क्षेत्र की कंपनियों से काम की आउटसोर्सिंग करने पर विचार कर रहे हैं. कर्मचारियों के काम-काज का आकलन करने के लिए समय सीमा, लक्ष्य और कार्य निष्पादन सरकारी क्षेत्रों में प्रमुख मापदंड बन गए हैं.

मिथक: सरकारी नौकरियों में वेतन बहुत अधिक दिया जाता है.
तथ्य: वस्तुतः यह सत्य सिर्फ प्रारंभिक स्तर के नौकरियों के विषय में सही है. राज्य सरकारी निकाय या केन्द्रीय सरकारी संगठन इनमें से किसी में भी  प्रवेश स्तर की नौकरियों में प्राइवेट नौकरियों की तुलना में बेहतर वेतन पैकेज मिलता है.
प्रवेश स्तर की नौकरियों के लिए तो यह बात बिलकुल सच है. लेकिन जब उच्च पदों के वेतन का प्रश्न उठता है तो सरकारी नौकरियों का महत्व इस मामले में कम हो जाता है. उच्च स्तर पर  एक सरकारी कर्मचारी अपने समान रैंक के निजी क्षेत्र के अधिकारी के वेतन के एक तिहाई से भी कम वेतन प्राप्त करता है.

मिथक: सरकारी नौकरियों में '9 से 5 बजे तक काम के घंटे' निश्चित होते हैं.
तथ्य: जो लोग यह मानते हैं कि सरकारी नौकरियां बहुत आरामदायक होती हैं और सिर्फ '9 से 5 बजे तक काम के घंटे' निश्चित होते हैं तो वे कहीं न कहीं ग़लतफ़हमी के शिकार हैं. अगर हम उच्च अधिकारियों के दैनिक काम काज के घंटे देखें तो ये लगभग 10-11 घंटे हो जायेंगे. कभी कभी तो यह समय 10-11 घंटे से भी अधिक का हो जाता है.

एक सरकारी अधिकारी के रूप में काम करना किसी रोलर कोस्टर की सवारी से कत्तई कम नहीं है. वस्तुतः अब सरकारी नौकरियों से जुडी आम अवधारणाओं से ऊपर उठने की जरुरत है.

प्रत्येक क्षेत्र चाहे वो निजी हो या सरकारी सबके अपने भिन्न भिन्न फायदे और नुकसान, सुविधा और असुरक्षा तथा पारिश्रमिक मापदंड हैं. अब यह पूरी तरह आप पर निर्भर करता है कि आप अपने लाभ की प्रवृति तथा जोखिम लेने की क्षमता के आधार पर अपने लिए सही क्षेत्र का चयन करें.

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