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Positive India: 5 IAS अधिकारी जो COVID-19 संकट में गरीबों को रोज़गार प्रदान कर रहे हैं

जहाँ पूरा देश कोरोना महामारी और उसके प्रतिकूल प्रभावों से जूझ रहा है, वहीं देश के अलग-अलग राज्यों में कार्यरत यह 5 IAS अधिकारी गरीब श्रमिकों को रोज़गार प्रदान कर उनका जीवन सुरक्षित कर रहे हैं। आइये जानते हैं इन 5 अद्भुत IAS अधिकारीयों की बारे में 

Jun 29, 2020 13:34 IST
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Positive India: 5 IAS अधिकारी जो COVID-19 संकट में गरीबों को रोज़गार प्रदान कर रहे हैं
Positive India: 5 IAS अधिकारी जो COVID-19 संकट में गरीबों को रोज़गार प्रदान कर रहे हैं

कोरोना वायरस महामारी के चलते देश में लाखों की संख्या में लोग बेरोज़गार हो गए हैं। ऐसे में कुछ ऐसे हैं जो वापस अपने गाँव और प्रदेश लौट रहे हैं। हालांकि अनलॉक 1 की प्रक्रिया के बाद रोज़गार के साधन वापस लौट रहे हैं। इसमें बड़ा योगदान सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्र में MGNREGA जैसी सरकारी प्रायोजित  योजनाओं का भी है। इसके अलावा जिला स्तर पर इन योजनाओं को सक्षम तरीके से लागू करने वाले IAS अधिकारी भी देश की प्रगति में अपना योगदान दे रहे हैं। आज हम आपको ऐसे ही 5 IAS अधिकारियों के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्होंने कोरोना महामारी के समय में अपने जिले के गरीब लोगों को बेरोज़गारी के अभिशाप से बचाया। 

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डॉ. आदर्श सिंह - DM बाराबंकी, उत्तर प्रदेश 

अप्रैल में कोरोनोवायरस महामारी के कारण बाराबंकी जिले के करीब 800 ग्रामीणों ने अपनी नौकरी खो दी थी। लेकिन जिलाधिकारी डॉ. आदर्श सिंह ने इन ग्रामीणों को पीड़ित अवस्था में छोड़ने की बजाये उनकी मदद करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने NREGA के तहत अपने जिले में एक नदी पुनर्स्थापन परियोजना शुरू की। यह परियोजना कल्याणी नदी के लिए शुरू की गई जिसका मिलान गोमती नदी में होता है। परियोजना के पहले चरण में मवैया गाँव में 2.6 किलोमीटर से अधिक सड़क को बहाल करने का कार्य था जिसके लिए 59 लाख रुपये से अधिक का आवंटन किया गया था। जीर्णोद्धार के लिए दूसरा खंड पड़ोसी गाँव हैदरगढ़ में 1.5 किमी लंबा है जहाँ काम जारी है।

लगभग 800 ग्रामीणों की आजीविका वैश्विक महामारी के कारण प्रभावित हुई थी, इस नदी परियोजना के तहत इन सभी ग्रामीणों को रोजगार मिला।

IAS प्रिंस धवन - DC लोहित, अरुणांचल प्रदेश 

अरुणांचल प्रदेश के लोहित जिले में रहने वाले कई प्रवासी श्रमिक घर वापस नहीं गए हैं। इसका कारण यह है कि जिला प्रशासन ने लॉकडाउन लागू होने पर ना  केवल राशन और आपूर्ति के साथ उनकी देखभाल की, बल्कि प्रतिबंध हटाए जाने पर उन्हें नौकरी भी प्रदान की।

जिले के DC प्रिंस धवन का कहना है कि " अरुणाचल में काम करने वाले अधिकांश श्रमिक राज्य के बाहर से हैं। हम जनरल रिजर्व इंजीनियर फोर्स (GREF), जो सीमा सड़क संगठन (BRO) के तहत काम करता है और राज्य में सड़क निर्माण का काम करने वाली अन्य सरकारी क्रियान्वयन एजेंसियों के साथ मिलकर जिले में चल रहे निर्माण गतिविधियों में इन श्रमिकों को रोज़गार प्राप्त करवा रहे हैं।"

उनका दावा है कि प्रशासन ने अब तक लगभग 350+ मजदूरों को लगाया है। इसके अतिरिक्त चूंकि तालाबंदी की घोषणा से पहले ही कृषि गतिविधियों की अनुमति थी इसलिए जिला प्रशासन एक किसान उत्पादक संगठन के साथ काम कर रहा है जिसमें 150 किसान बागवानी (Horticulture) से जुड़े हैं।

प्रिंस बताते हैं कि "हमने एस्कुट नट, केला, काली मिर्च, नारंगी, हल्दी, आदि के लिए रोपाई वितरित की है। हम 150 किसानों को ये इनपुट दे रहे हैं, जिनके पास 1 हेक्टेयर ज़मीन है। ये किसान इन मजदूरों को भी रोज़गार दे रहे हैं। हमने बागान मालिकों के साथ साझेदारी में चाय बागानों में रोजगार के रास्ते भी खोले हैं। 

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IAS अरविन्द सिंह - चीफ डेवलपमेंट अफसर, लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश 

आईएएस अधिकारी अरविंद सिंह के मार्गदर्शन में, लखीमपुर खीरी में ग्रामीण महिलाओं ने थोक में ग्लोबल स्टैण्डर्ड पीपीई किट तैयार किए हैं। इन PPE किट को काम से काम समय में उत्तम गुणवत्ता से तैयार करने के लिए सिंह ने अपनी टीम के साथ मिल कर ऑपरेशन कबच की शुरुआत की। इसके तहत सिंह ने जल्द से जल्द कच्चे माल की खरीद के लिए कोल्ड कॉलिंग आपूर्तिकर्ताओं की शुरुआत की। उनकी टीम ने गुणवत्ता, डिजाइन, प्रक्रिया और निश्चित रूप से उन महिलाओं की क्षमता-निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया जो इस पहल में शामिल थीं। महिलाओं को किट को डिजाइन करने में सावधानीपूर्वक प्रशिक्षित किया गया जिसमें उन्हें पॉलीप्रोपाइलीन आवरण, काले चश्मे, चेहरे की ढाल, मास्क, दस्ताने और जूता कवर इत्यादि को बनाने के लिए प्रशिक्षित किया गया। 

लखनऊ के नॉर्दर्न कमांड्स आर्मी बेस हॉस्पिटल ने ऑपरेशन कबच से 2000 पीपीई किट ऑर्डर किए हैं। इस बीच, 41 वीं इन्फैंट्री ब्रिगेड के लखनऊ छावनी ने 52 किट का ऑर्डर दिया है, और कुमाऊं इंदौर डिवीजन ने 20 किट का ऑर्डर दिया है जबकि सशस्त्र सीमा बल ने 30 पीपीई किट का ऑर्डर दिया है। इनमें से ज्यादातर ऑर्डर पहले ही डिलीवर हो चुके हैं। अरविन्द सिंह की इस मुहीम से जिले की सैकड़ों महिलाओं को रोज़गार मिला है। 

उन्होंने ऑपरेशन "चतुर्भुज" भी शुरू किया है जो की एक सड़क निर्माण परियोजना है जिसका उद्देश्य बेरोजगार ग्रामीण लोगों को रोजगार खोजने में मदद करना है। “महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत परियोजना का उद्देश्य हजारों नौकरी-इच्छुक लोगों को रोजगार प्रदान करना, सड़कों के सीमांकन के बाद विवादों को कम करना, चकबंदी’ के बाद सड़क संपर्क प्रदान करना और सड़कों के दोनों ओर वृक्षारोपण के माध्यम से बढ़ावा देना है। 

IAS नवीन कुमार चंद्रा - असिस्टेंट कलेक्टर, मालदा पश्चिम बंगाल  

नवीन का मालदा जिले की महिलाओं को रोज़गार देने का सफर उन्हीं के कार्यालय के एक डाटा एंट्री ऑपरेटर कार्तिक की मदद करने से  शुरू हुआ। नवीन को हस्तशिल्प उत्पादों को तैयार करने के लिए कार्तिक की प्रतिभा के बारे में पता था, इसलिए  उन्होंने कार्तिक को अपनी कला को काम में लाने के लिए प्रोत्साहित किया। फरवरी 2020 में कार्तिक ने हस्तनिर्मित बांस की पानी की बोतलें बनाना शुरू कर दिया।

कार्तिक के काम की गुणवत्ता को देखते हुए, मालदा जिला प्रशासन ने उन्हें आवश्यक मशीनरी की खरीद में मदद की और उन्हें एक छोटी कार्यशाला स्थापित करने में मदद की, जहां उन्होंने मई तक 30 महिलाओं को स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) से प्रशिक्षित करना शुरू किया।

स्थानीय रूप से उपलब्ध बांस के साथ, कच्चे माल की खरीद में कोई समस्या नहीं हुई। कार्तिक के पास अब आय का एक अतिरिक्त स्रोत है, क्योंकि महिलाएं ना  केवल पानी की बोतल और अन्य कटलरी जैसी बांस की वस्तुओं को तैयार करती हैं बल्कि अपने उत्पादन को बढ़ाने के लिए मशीनरी का उपयोग कर रही हैं। उन्होंने इन उत्पादों को स्थानीय रूप से बेचना शुरू कर दिया है, ये उत्पाद इस महीने के अंत तक अमेज़न जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफार्मों पर बिक्री के लिए उपलब्ध होंगे।

देवांश यादव - DC चांगलांग, अरुणांचल प्रदेश 

नॉर्थ ईस्टर्न कम्यूनिटी रिसोर्स मैनेजमेंट प्रोजेक्ट (NERCORMP), नॉर्थ ईस्ट काउंसिल की एक परियोजना के साथ काम करते हुए, कलेक्टर देवांश यादव ने स्थानीय स्वयं सहायता समूहों (SHG) को सैनिटरी पैड बनाने और बांस फर्नीचर बनाने जैसे प्रयासों को बढ़ावा दिया है।

बोर्डमासा सर्कल में सैनिटरी पैड बनाने वाली यूनिट चलाने वाला एक SHG वर्तमान में लगभग 10 महिलाओं को रोजगार देता है, लेकिन क्षमता वृद्धि के साथ वे कम से कम 20 और महिलाओं को रोजगार दे सकेंगे। उनके सैनिटरी पैड कवरंटीन केंद्रों को वितरित किए गए हैं। अब तक लगभग 3,50,000 रुपये के सैनिटरी पैड बिक चुके हैं।

देवांश बताते हैं की “बोरदूम में एक और समूह था जो बांस के फर्नीचर बनाने में बहुत रुचि रखता था। फरवरी में हमने उन्हें नाबार्ड के संपर्क में रखा जिसने उन्हें प्रशिक्षित किया। मार्च के अंत तक उनका प्रशिक्षण समाप्त हो गया था जिसके बाद प्रशासन ने फर्नीचर के लिए एक आर्डर दिया और उन्हें इसे बनाने के लिए उपकरण दिए। पिछले हफ्ते उन्होंने दो सोफा सेट, स्टडी लैंप, टेबल और अन्य कार्यालय स्टेशनरी आइटम जैसे कि पेन होल्डर्स को 43,000 रुपये (दो सोफा सेटों के लिए 30,000 रुपये सहित) दिए।"

इस एसएचजी में कार्यरत 12 लोग सोफा सेट, प्लेट, कार्यालय स्टेशनरी आइटम, कप, टेबल, स्टडी लैंप, पानी के जग और बांस से बने विभिन्न घरेलू सामान बना रहे हैं। यह यूनिट वर्तमान में स्थानीय दुकानदारों के साथ संबंध स्थापित कर रही है और अपना सामान स्थानीय लोगों को बेच रही है।

चूंकि प्रवासी मजदूर वापस आने लगे हैं (पूर्वोत्तर के बाहर के क्षेत्रों से लगभग 3500 और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों से लगभग 5000), चांगलांग जिला प्रशासन ने अपने पास मौजूद कौशल सेट के बारे में जानने के लिए एक श्रम सर्वेक्षण शुरू किया। इन परियोजनाओं में प्रवासियों को शामिल कर उन्हें रोज़गार प्रदान करने की योजना है।

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