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क्या आप जानते हैं भारतीय लघु कला चित्रकारी कैसे विकसित हुई?

मिनीएचर (Miniature) का मतलब होता है लाघु लैटिन शब्द 'मिनियम' से व्युत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ 'लाल रंग का शीशा' होता है। भारतीय उप-महाद्वीप में लघु चित्रकारी का लम्बा परम्परा रहा है और इसका विकास कई शैलियों में हुआ है। इस लेख में हमने भारतीय लघु चित्रकारी के विकास को लघु चित्रकारी का क्रमागत उन्नति के बारे में बताया है, जो UPSC, SSC, State Services, NDA, CDS और Railways जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए बहुत ही उपयोगी है।
Sep 7, 2018 14:43 IST
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How Indian Art of Miniature Painting evolved? HN
How Indian Art of Miniature Painting evolved? HN

मिनीएचर (Miniature) का मतलब होता है लाघु जो लैटिन शब्द 'मिनियम' से व्युत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ 'लाल रंग का शीशा' होता है। भारतीय उप-महाद्वीप में लघु चित्रकारी का लम्बा परम्परा रहा है और इसका विकास कई शैलियों में हुआ है। “समरांगण सूत्रधार” नामक वास्तुशास्त्र में इसका विस्तृत रूप से उल्लेख मिलता है। इस शिल्प की कलाकृतियाँ सैंकड़ों वर्षों के बाद भी ऐसा लगता है की ये कुछ वर्ष पूर्व ही चित्रित की गई हों।

लेकिन अहम् सवाल ये है की- “किस तरह की चित्रकारी को लघु चित्रकला के रूप में माना जाता है?" ऐसा चित्र जिनकी संरचना और अनुपात 25 वर्ग इंच (100 वर्ग सेमी से कम हो) तथा अनुपात 1/6 से अधिक न हो उसे लघु चित्र कहा जाता हैउदाहरण के लिए तूतिनामा और हमज़ानामा हैं।  

लघु चित्रों की विशेषताएं

1. इस तरह की चित्रकारी में हस्तनिर्मित रंगों का इस्तेमाल किया जाता है और ये हस्तनिर्मित रंग सब्जियों, खनिजों, नील, शंख के गोले, कीमती पत्थरों, शुद्ध सोने और चांदी से बनाया जाता है।

2. इस प्रकार के चित्रकला में भारतीय शास्त्रीय संगीत के धुनों के साथ घनिष्ठ संबंध होता है।

3. इन तरह की चित्रकला में, मानव आकृति एकपृष्ठीय (Side Profile) रूपरेखा के साथ दिखाई देती है, जिसमे उभरी आँखे, नुकीली नाक और पतली कमर को विस्तार से दर्शाया जाता है।

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भारत में लघु चित्रकारी का विकास

भीमबेटका शैलाश्रय में जिस प्रकार की चित्रकारी देखने को मिलती है उससे ऐसा प्रतीत होता है की लघु चित्रकारी का विकास 30,000 वर्ष पहले ही हो गया था, इसलिए हम कह सकते है की यह प्रागैतिहासिक कला है। भारत में और भी ऐसे शैलाश्रय हैं जहा पर जानवरों, नृत्य और शिकार के शुरुआती साक्ष्य जैसे विषयों को चित्र के माध्यम से दर्शाया गया है- उदहारण के तौर पर अजंता गुफा चित्रकारी (2रीं शताब्दी ईसा पूर्व से 5 वीं शताब्दी ईस्वी), मध्य प्रदेश की बाग गुफाएं।    

लघु चित्रकला का विकास वास्तविक रूप से 9वीं और 11वीं शताब्दी के बीच में हुआ है। इस तरह की चित्रकला के लिए पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्रों को श्रेय दिया जा सकता है। शुरुवात में इस तरह की चित्रकारी ताड़ पत्र या चर्मपत्र पर की जाती थी फिर बाद में कागज पर होने लगा।

इन चित्रों की विशेषता लहरदार रेखाए और शांत पृष्ठभूमि होती है। चित्रों में ज्यादातर अकेली आकृतियाँ होती है और कदाचित ही समूह में पाए जाते हैं। पाल साम्राज्य के दौरान इन्हें बौद्ध धर्म को बढ़ावा देने के लिए इसका प्रयोग किया जाता था। इसलिए बौद्ध धर्म के वज्रयान शाखा के समर्थको ने इस चित्रकला को समर्थन दिया और संरक्षण भी दिया। कृष्ण लीला, राग रागिनी, नायिका भेदा, रितु चित्र (मौसम), पंचतंत्र जैसे विषयों पर भी इस तरह की चित्रकारी की जाती रही है।

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भारतीय उप-महाद्वीप  में मुसलमानों के आगमन ने लघु चित्रकारी में थोड़ी फेर बदल हुई लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं कहा जा सकता की इस्लामी शैलियाँ ही छा गयी थी। विजयनगर के दक्षिणी राज्य में, एक अलग शैली उभर रही थी जो दक्कन शैली से मिलता जुलता था। इस काल का सबसे अच्छा उदहारण वीरभद्र मंदिर के चित्र हैं जिसके दीवारों पर अमूर्त रूपांकानों से चित्रित हैं। जिसको लेपक्षी चित्रकला भी बोला जाता है।

सल्तनत काल में लघु चित्रकारी में फारसी तत्वों का संश्लेषण मिलता है। इनमे सचित्र पांडुलिपियों को वरीयता दी जाती थी- उदाहरण के तौर पर, मांडू पर शासन करने वाले नासिर शाह के दौर का ‘निमतनामा’। इस पाण्डुलिपि में स्वदेशी और फारसी शैलियों  का  संश्लेषण मिलता है। इस दौरान लोदी खुलादर नमक एक और शैली का विकास हुआ था जिसका अनुसरण दिल्ली और जौनपुर के बीच क्षेत्रों में किया जाता था।

मुग़ल काल में लघु चित्रकारी को एक नया आयाम मिला क्योंकी इससे पहले इश्वर को चित्रित किया जाता था लेकिन इस काल में शासक का महिमामंडल करने और उनके जीवन दर्शाने पर अधिक जोर दिया गया। उदारहण के तौर पर- आखेट के दृश्य, एतिहासिक घटना  और दरबार से सम्बंधित विषयों का चित्रण किया गया है। इस काल में चमकीलें रंगों के इस्तेमाल ने लघु चित्रकारी को अद्वितीय बना दिया।

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लघु चित्रकारी और मुग़ल शासक

वैसे तो बाबर को अधिक समय नहीं मिला था क्योंकी मुग़ल राज्यवंश को स्थापित करने के लिए अपने ज्यादातर जीवन काल में युद्ध ही करता रहा लेकिन फारसी कलाकार बिह्जाद को संरक्षण देने वाला कहा जाता है। उसने मुग़ल वंश-वृक्ष के कुछ चित्र बनाये थे।

हुमायूँ के शासन काल में अब्दुस समद और मीर सईद  अली जैसे लघु चित्रकारों ने फारसी प्रभाव का तड़का लगा दिया था और उन्होंने कई सफल सचित्र एलबमों की रचना की थी।

अकबर के शासन काल में, लघु चित्रकारी को विभागीय समर्थन मिला क्योंकी अकबर ने दस्तावेजों के सुलेखन के लिए एक पुरे विभाग की स्थापना की थी। इस दौर में कलाकारों को अपने तरह के शैलियों के विकास के लिए पूरी छुट दी गयी थी। चित्रकला को अकबर अध्ययन और मनोरंजन का साधन के रूप में देखता था। उसके अनुसार चित्र विषय का व्यवहार दर्शाता है और सजीव चित्र बनाने वालों को नियमित रूप से पुरस्कृत भी किया करता था। अकबर काल में त्रिआयामी चित्रकला और अग्रदृश्यांकन का व्यापक प्रयोग किया जाता था।

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जहाँगीर के शासन काल में लघु चित्रकारी अपनी परकाष्ठा पर पहुच गयी थी। इस काल में ज्यादातर चित्रकारी प्रकृति, वनस्पति और जीवों के आस-पास ही रही थी क्योंकी वह प्रकृतवादी था। इस काल में अलंकृत किनारों या बॉर्डर वाली चित्रकारी का विकास हुआ था। उस्ताद मंसूर इस काल के प्रसिद्द कालाकारो में से एक थे।  

शाहजहाँ के काल में लघु चित्रकारी में तेज़ी से परिवर्तन आया था। इस काल में कृत्रिम तत्वों पर चित्रकारी को बढ़ावा मिला था क्योंकी ऐसा कहा जाता है की उसे अपने दरबार में यूरोपीय प्रभाव से प्रेरित था। इस काल चित्रकारी के लिए लकड़ी के कोयले, पेंसिल सोने और चांदी का प्रयोग किया जाता था।

इसलिए हम कह सकते हैं की दुसरे मुग़ल शासकों के अपेक्षा शाहजहाँ के शासन के दौरान मुग़ल चित्रशाला का विस्तार हुआ और शैली तथा तकनीक में भी बहुत कुछ परिवर्तन भी आया। भले ही मध्यकाल में मुग़ल चित्रकारी शैली का दबदबा रहा था लेकिन उप-साम्राज्यिक चित्रकरी शैली ने अपनी ही तरह की शैली का विकास किया। उन्होंने अपनी भारतीय जड़ो को भूले बिना प्रक्रितिकता वाली मुग़ल शैली के विपरीत रंगीन चित्रकला को भी जिंदा रखा।

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