MPLAD स्कीम के तहत केंद्र सरकार द्वारा सांसदों को कितनी धनराशि दी जाती है?

Sep 5, 2017, 15:47 IST

सांसद लोकल एरिया डेवलपमेंट (एमपीएलएडी) स्कीम को दिसंबर 1993 में पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव द्वारा शुरू किया गया था. यह स्कीम क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार की एक महत्वपूर्ण योजना है. लोकसभा के लिए चुना गया सांसद “अपने चुनाव क्षेत्र” में हर साल 5 करोड़ रुपये खर्च करवा सकता है. राज्य सभा के सदस्य को भी इतना ही फंड मिलता है और सदस्य इसे “पूरे राज्य में कहीं भी” खर्च करने की सिफारिस कर सकता है.

MPLAD स्कीम क्या है
MPLAD स्कीम क्या है

सांसद लोकल एरिया डेवलपमेंट (MPLAD) स्कीम क्या है
सांसद लोकल एरिया डेवलपमेंट (एमपीएलएडी) स्कीम को दिसंबर 1993 में पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव द्वारा शुरू किया गया था. यह स्कीम क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार की एक महत्वपूर्ण योजना है. योजना प्रत्येक संसद सदस्य (एमपी) को अपने विकास के लिए अपने चुनाव क्षेत्र में एक निश्चित राशि खर्च करने की शक्ति प्रदान करती है. लोकसभा के लिए चुना गया सांसद “अपने चुनाव क्षेत्र” में हर साल 5 करोड़ रुपये खर्च करवा सकता है. राज्य सभा के सदस्य को भी इतना ही फंड मिलता है और सदस्य इसे “पूरे राज्य में कहीं भी” खर्च करने की सिफारिस कर सकता है.
लोकसभा और राज्यसभा के मनोनीत सदस्य देश के किसी भी एक राज्य या एक से अधिक जिलों का चयन कर सकते हैं.
किन योजनाओं पर खर्च किया जाता है?
सांसद को यह अधिकार है कि वह अपने चुनाव क्षेत्र में 5 करोड़ रूपये का विकास कार्य करा सके. इस योजना में कार्यों का निर्धारण मुख्य रूप से जिले या क्षेत्र की जरूरतों के हिसाब से किया जाता है. मुख्य कार्य इस प्रकार हैं जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, बिजली, परिवार कल्याण, स्वच्छता, सामुदायिक संपत्ति का निर्माण आदि.

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MPLAD स्कीम कैसे कार्य करती है?
इस योजना के क्रियान्वयन में 3 लोग भागीदार होते हैं: 1. सांसद 2. जिलाधिकारी 3.भारत सरकार
भारत सरकार रुपयों का आवंटन करती है; सांसद, जिलाधिकारी को आदेश देता है कि कौन से कार्य कराये जाने हैं और जिलाधिकारी यह तय करता है कि काम किस तरह से कराया जायेगा. भारत सरकार सालाना 5 करोड़ की वार्षिक राशि का वितरण 2.5 करोड़ की दो सामान किस्तों में करती है.
कार्य के संपादन और लोक प्रतिनिधियों द्वारा किए गए काम का इंटरनेट ऑडिट करने के लिए सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय एक नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करती है. MPLAD स्कीम एक केन्द्र प्रायोजित योजना है जिसे पूरी तरह से भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित किया गया है. इस योजना के अंतर्गत "फंड को ग्रांट इन ऐड" के रूप में निधियों को सीधे जिला प्राधिकरणों को जारी किया जाता है.
इस योजना में सांसद, जिलाधिकारी को इस बात का सुझाव देता है कि जिले में कौन से काम कराये जाने हैं. काम कैसे कराया जायेगा इस बात का फैसला जिलाधिकारी करता है सांसद नही. सामान्य तौर पर जिलाधिकारी इस काम के लिए एक कमेटी बना देता है जो कि इस काम को पूरा कराती है.
सांसद मुख्य रूप से इन कामों को कराने का सुझाव है जिलाधिकारी को देता है: पीने के पानी की सुविधा, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, सिंचाई, सड़कों और सामुदायिक भवनों का निर्माण आदि का विकास.

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हर सांसद के पास यह अधिकार होता है कि वह जिला कलेक्टर को आदेश दे कि किसी भी एक काम के लिए अधिकत्तम 25 लाख रुपये खर्च करे. पहले प्रत्येक काम के लिए यह सीमा 10 लाख रुपये थी. कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा इस योजना को प्रभावी ढंग से लागू होने और समय-समय पर काम की भौतिक और वित्तीय स्थिति को ठीक करने के लिए समय समय पर दिशा निर्देश जारी किये जाते हैं. इसमें जिलाधिकारी के लिए यह जरूरी है कि वह पूरे काम का करीब 10% हिस्सा स्वयं चेक करे.
भारत में इस योजना के माध्यम से कई क्षेत्रों का विकास किया जा चुका है और निर्वाचन क्षेत्र के स्थानीय निवासियों को मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराकर उनकी जिंदगी को आसान बनाया जा चुका है. इस योजना की कामयाबी का मुख्य कारण यह भी है कि सांसद को इस बात का लालच होता है कि यदि वह अपने चुनाव क्षेत्र का विकास वर्तमान कार्यकाल में करेगा तो लोग इसे अगली चुनाव में भी वोट देंगे.

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