आजादी के समय किन रियासतों ने भारत में शामिल होने से मना कर दिया था और क्यों?

आजादी के दौरान भारत 565 देशी रियासतो में बंटा था. ये देशी रियासतें स्वतंत्र शासन में यकीन रखती थी जो सशक्त भारत के निर्माण में सबसे बडी़ बाधा थी. हैदराबाद, जूनागढ, भोपाल और कश्मीर को छोडक़र 562 रियासतों ने स्वेज्छा से भारतीय परिसंघ में शामिल होने की स्वीकृति दी थी. वर्ष 1947 'भारत' के अन्तर्गत तीन तरह के क्षेत्र थे- (1) 'ब्रिटिश भारत के क्षेत्र' , (2) 'देसी राज्य' (Princely states) और फ्रांस और पुर्तगाल के औपनिवेशिक क्षेत्र.
Jan 24, 2019 17:30 IST
    India Map

    अंग्रेजों ने भारत को लगभग 200 सालों तक गुलाम बनाया था और इस गुलामी से आजादी पाने के लिए हजारों लोगों के द्वारा कुर्बानी दिए जाने के बाद अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत को आजादी मिली थी. आजादी के समय भारत एक टूटा-फूटा राष्ट्र था. जब 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली उस समय 'भारत' के अन्तर्गत तीन तरह के क्षेत्र थे-

    (1). 'ब्रिटिश भारत के क्षेत्र' - ये लंदन के इण्डिया आफिस तथा भारत के गवर्नर-जनरल के सीधे नियंत्रण में थे,

    (2). 'देसी राज्य' (Princely states)

    (3). फ्रांस और पुर्तगाल के औपनिवेशिक क्षेत्र (चन्दननगर, पाण्डिचेरी, गोवा आदि).

    देशी रियासतें राजा के शासन के अधीन थी लेकिन ब्रिटिश राजशाही से सम्बद्ध थी.

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    भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के अंतर्गत दो स्वतंत्र एवं प्रथक प्रभुत्व वाले देश भारत और पाकिस्तान बनाये गये. देशी रियासतों के सामने तीन विकल्प रखे गये;

    1. या तो भारत में शामिल हो

    2. या तो पाकिस्तान के शामिल हो

    3.  स्वतंत्र रहें

    आजादी के दौरान भारत 565 देशी रियासतों में बंटा था. ये देशी रियासतें स्वतंत्र शासन में यकीन रखती थी जो सशक्त भारत के निर्माण में सबसे बडी़ बाधा थी. हैदराबाद, जूनागढ,  और कश्मीर को छोडक़र 562 रियासतों ने स्वेच्छा से भारतीय परिसंघ में शामिल होने की स्वीकृति दी थी. जूनागढ़ रियासत पाकिस्तान में मिलने की घोषणा कर चुकी थी वहीँ काश्मीर ने स्वतंत्र बने रहने की इच्छा व्यक्त की. हालाँकि भोपाल की रियासत भी भारत में शामिल नहीं होना चाहती थी लेकिन बाद में वह भारत में शामिल हो गयी. सबसे बाद में शामिल होने वाली रियासत भोपाल ही थी.

    जूनागढ़, कश्मीर तथा हैदराबाद तीनों राज्यों को सेना की मदद से विलय करवाया गया. सरदार पटेल तब अंतरिम सरकार में उप-प्रधानमंत्री के साथ देश के गृहमंत्री भी थे.

    आइये इस लेख में जानते हैं कि किस प्रकार भारत सरकार ने इन तीनों रियासतों को भारत में मिलाया था.

    1. जूनागढ़ रियासत:

    junagarh STATE

    जूनागढ़ पश्चिम भारत के सौराष्ट्र इलाके का एक बड़ा राज्य था. वहां के नवाब महावत खान की रियासत का ज़्यादातर हिस्सा हिंदुओं का था. मुस्लिम लीग और जिन्ना के इशारों पर जूनागढ़ के दीवान अल्लाहबख्श को अपदस्थ करके बेजनीर भुट्टो के दादा शाहनवाज़ भुट्टो को वहां का दीवान बनाया गया था. शाहनवाज़ भुट्टो ने महावत खान पर दवाब बनाया और इस दबाव में आकर महावत खान ने 14 अगस्त, 1947 को जूनागढ़ के पाकिस्तान में विलय का ऐलान कर दिया. लेकिन सरदार पटेल ने जूनागढ़ के दो बड़े प्रांत, मांगरोल और बाबरियावाड़, पर ब्रिगेडियर गुरदयाल सिंह के नेतृत्व में सेना भेजकर कब्ज़ा कर लिया और फिर नवंबर माह में भारतीय फौज ने पूरे जूनागढ़ पर कब्ज़ा कर लिया. वीपी मेनन और पटेल के इस फैसले से लार्ड माउंटबेटन नाराज़ हो गए. इसके बाद पटेल ने उनको खुश करने के लिए जूनागढ़ में जनमत संग्रह करवाया जिसमें 90% से ज़्यादा जनता ने भारत में विलय को स्वीकार किया. इस तरह से 20 फरवरी, 1948 को जूनागढ़ देश का हिस्सा बन गया और महावत खान पाकिस्तान भाग गया.

    2. हैदराबाद की रियासत:

    hyderabad princely state

    यह रियासत ढक्कन के पठार में स्थित थी. हैदराबाद राज्य काफी साधन-संपन्न था. इसका नवाब निजाम उस्मान अली खान था. ब्रिटिश न्यूजपेपर ‘द इंडिपेंडेन्ट’ की एक खबर के अनुसार हैदराबाद के निजाम (1886-1967) की कुल संपत्ति 236 अरब डॉलर आंकी गई थी, जबकि आज मुकेश अंबानी की संपत्ति 40 अरब डॉलर ही है. निजाम का 80 की उम्र में 1967 में निधन हो गया था. नवाब उस समय दुनिया के सबसे बड़े अमीरों में शामिल था. निजाम उस्मान अली खान की रियासत में भी 85 फीसदी हिंदू थे पर सेना और शासन में मुसलमानों का दबदबा था.

    अंग्रेज़ों के शासन में भी हैदराबाद की अपनी सेना, डाक तार विभाग और रेल सेवा हुआ करती थी. उस समय आबादी और कुल राष्ट्रीय उत्पाद की दृष्टि से हैदराबाद भारत का सबसे बड़ा राजघराना था. उसका क्षेत्रफल 82,698 वर्ग मील था जो कि इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कुल क्षेत्रफल से भी अधिक था.

    निजाम की मंशा हैदराबाद की रियासत को आज़ाद रखने की थी. निजाम, पाकिस्तान और इंग्लैंड की सरकार को हाथों कि कठपुतली बना हुआ था. निजाम को जिन्ना ने भरोसा दिलाया था कि वह भारत के खिलाफ सैन्य कार्यवाही से पीछे ना हटे और जरूरत पड़ने पर पाकिस्तान की सेना भी उसका साथ देगी.

    सरदार पटेल हैदराबाद की आजादी को भारत के पेट में कैंसर की तरह देखते थे.

    माउंटबेटन चाहते थे कि हैदराबाद, भारत में शांतिपूर्वक मिल जाये और नेहरु भी इस बात का समर्थन करते थे लेकिन पटेल हमले की कार्यवाही करना चाहते थे. इसी बीच हैदराबाद को लड़ाई के लिए उकसाने वाले जिन्ना की मृत्यु 11 सितम्बर 1948 को हो गयी. पटेल ने इसे मौके की तरह लिया और पुलिस कार्यवाही का सहारा लिया.

    भारतीय पुलिस ने हैदराबाद पर आक्रमण करने के लिए “ऑपरेशन पोलो” (13 सितम्बर 1948 – 18 सितम्बर 1948) चलाया था क्योंकि उस समय हैदराबाद में विश्व में सबसे ज़्यादा 17 पोलो के मैदान थे.

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    जैसे ही भारतीय पुलिस हैदराबाद में घुसी, पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाक़त अली ख़ाँ ने अपनी डिफ़ेंस काउंसिल की बैठक बुलाई और उनसे पूछा कि क्या हैदराबाद में पाकिस्तान कोई कदम उठा सकता है? बैठक में मौजूद ग्रुप कैप्टेन एलवर्दी ने कहा ‘नहीं.’

    लियाक़त ने ज़ोर दे कर पूछा ‘क्या हम दिल्ली पर बम नहीं गिरा सकते हैं? एलवर्दी का जवाब था कि हाँ ये संभव तो है लेकिन पाकिस्तान के पास कुल चार बमवर्षक हैं जिनमें से सिर्फ़ दो काम कर रहे हैं.' इनमें से एक शायद दिल्ली तक पहुँच कर बम गिरा भी दे लेकिन इनमें से कोई वापस नहीं आ पाएगा.'

    पांच दिनों के अंदर ही हैदराबाद के रज़ाकारों की कमर टूट गयी और 17 सितम्बर, 1948 को निजाम उस्मान अली ने पटेल के सामने हाथ जोड़ दिए और भारत में विलय हेतु विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए. रिपोर्ट के मुताबिक इस अभियान में 27 से 40 हजार जाने गई थी हालाँकि जानकार ये आंकड़ा दो लाख से भी ज्यादा बताते है.

    osman ali khan

    (निजाम उस्मान अली खान)

    3. कश्मीर रियासत:

    हैदराबाद और जूनागढ़ के विपरीत इस रियासत के राजा हरी सिंह हिन्दू थे लेकिन वे मुस्लिम बहुल क्षेत्र के राजा थे. बंटवारे के समय कश्मीर के राजा ने स्वतंत्र रहने का निश्चय किया था. महाराजा का यह फैसला उस समय गलत सिद्ध हो गया जब जिन्ना के कहने पर 20 अक्टूबर 1947 को कबाइली लुटेरों के भेष में पाकिस्तानी सेना को कश्मीर में भेज दिया और उन्होंने दुकानों के लूटपाट शुरू कर दी घरों में चोरी और आगजनी करने के साथ ही महिलाओं को भी अगवा कर लिया और इसी तरह की तबाही मचाते हुए पूर्वी कश्मीर की तरफ बढ़ रहे थे तो महाराजा हरीसिंह ने जवाहरलाल नेहरु से सैन्य मदद मांगी. 

    अक्टूबर 26, 1947 को दोनों देशों के बीच विलय का समझौता हुआ. इस समझौते के तहत 3 विषयों; रक्षा, विदेशी मामले और संचार को भारत के हवाले कर दिया गया था. तभी से लेकर आज तक कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच झगड़े की जड़ बना हुआ है.

    4. त्रावणकोर रियासत

    दक्षिणी भारत में स्थित इस राज्य पर त्रावणकोर राजपरिवार का शासन था. यह पहली रियासत थी जिसने भारतीय संघ में शामिल होने से मना कर दिया था.  सन 1946 में त्रावणकोर के दीवान सर सी. पी. रामामस्वामी अय्यर ने त्रावणकोर को स्वतंत्र राज्य बनाने की अपनी मंशा जाहिर की थी. समुद्र के किनारे स्थित यह राज्य मानव और खनिज संसाधन दोनों में समृद्ध था.

    महाराज श्री चितिरा तिरुनल बलराम वर्मा (1924-1949) के राजकाल में राज्य ने सामाजिक और आर्थिक उत्थान के लिये कई प्रयत्न किये जिनसे यह ब्रिटिश शासन के अधीन भारत का दूसरा सबसे समृद्ध रियासत बन गया था.

    जिन्ना ने इस राज्य को भी भारत से बाहर रहने के लिए भड़काया था लेकिन जब जुलाई 1947 के अंत में “केरल सोशलिस्ट पार्टी” के एक सदस्य द्वारा इनकी हत्या करने के प्रयास किया गया तो उन्होंने 30 जुलाई 1947 को, त्रावणकोर भारत में शामिल करने पर सहमती जाता दी.

    5. भोपाल रियासत

    भारत संघ में शामिल होने वाली अंतिम रियासत भोपाल थी. इस रियासत के नवाब थे हमीदुल्लाह खान जिनकी रियासत भोपाल, सीहोर और रायसेन तक फैली हुई थी. इस रियासत की स्थापना 1723-24 में औरंगजेब की सेना के बहादुर अफगान योद्धा दोस्त मोहम्मद खान ने की थी.

    Hamidullah Khan Nawab of Bhopal

    इस रियासत की बगावत के पीछे भी पाकिस्तान के जिन्ना का हाथ था. जिन्ना इस नवाब को पाकिस्तान में सेक्रेटरी जनरल का पद देकर वहाँ आने की पेशकश दे चुके थे लेकिन नवाब को रियासत का मोह था उसने बेटी आबिदा को भोपाल रियासत का शासक बन जाने को कहा ताकि वो  पाकिस्तान जाकर सेक्रेटरी जनरल का पद सभाल सकें, किन्तु आबिदा ने इससे इनकार कर दिया था.

    हमीदुल्लाह खान सन 1926 में इस रियासत के नवाब बने थे. वे अलीगढ़ विश्वविद्यालय से शिक्षित नवाब हमीदुल्लाह दो बार 1931 और 1944 में चेम्बर ऑफ प्रिंसेस के चांसलर बने तथा भारत विभाजन के समय वे ही चांसलर थे. मार्च 1948 में नवाब हमीदुल्लाह ने भोपाल के स्वतंत्र रहने की घोषणा की थी. मई 1948 में नवाब ने भोपाल सरकार का एक मंत्रीमंडल घोषित कर दिया था. लेकिन वी के मेनन और सरदार पटेल ने उन पर भारत में शामिल होने का दबाव बना रखा था जिसके कारण नवाब ने 30 अप्रैल 1949 को भारत में विलीनीकरण पर हस्ताक्षर कर दिए और अंततः 1 जून 1949 को भोपाल रियासत, भारत का हिस्सा बन गई.

    तो इस प्रकार आपने पढ़ा कि अंग्रेजों ने किस प्रकार टूटा फूटा देश हमारे नेताओं के हवाले किया था. यदि हमारे देश में उस समय कुशाग्र नेतृत्व नहीं होता तो देश आज भी टुकड़ों में बंटा होता. इस लेख में आप जानेंगे कि देश को एकता के सूत्र में बंधना कितना कठिन कार्य होता है.

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