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पुत्तापका (तेलंगाना) के तेलिया रूमाल को भौगोलिक संकेत का दर्जा: जानिये क्या है इसका इतिहास

तेलिया रूमाल को 12 मई 2020 को भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री द्वारा भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग दिया गया है. इस रूमाल को तेलिया इस लिए कहा जाता है क्योंकि इसे बनाने में तेल का इस्तेमाल किया जाता है जिससे यह कपडा नर्म बना रहता है और एक विशेष प्रकार की खुश्बू छोड़ता है. यह रूमाल तेलंगाना के पुत्तापका गाँव में बनाया जाता है. आइये इस बारे में और विस्तार से जानते हैं.
May 21, 2020 14:43 IST
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हर क्षेत्र की अपनी कोई ना कोई विशेषता होती है, भारत के किसी राज्य में कहीं मिठाई अच्छी बनती है तो कहीं कपडे अच्छे बनते हैं और कहीं हेंडीक्राफ्ट का सामान बहुत ही सस्ता और अच्छा बनता है.

प्रदेशों की इसी पहचान को बचाए रखने के लिए उत्पादों को एक विशेष संरक्षण दिया जाता है ताकि इसका किसी और राज्य में डुप्लीकेट उत्पाद ना बनाया जा सके. इसे ही भौगोलिक संकेत (GI) टैग कहा जाता है.

भौगोलिक संकेत (GI) टैग के बारे में (About GI Tag)

एक भौगोलिक संकेत (GI) एक ऐसा नाम या प्रतीक होता है जिसे किसी क्षेत्र के किसी विशिष्ट उत्पाद को दिया जाता है जो कि अपनी लोकेशन और बनाने के तरीके में सबसे अलग पहचान वाला होता है. 

यानी कि यह एक उत्पाद की ऐसी पहचान बना देता है कि किसी विशेष जगह का नाम लेती ही कोई विशेष उत्पाद याद आ जाता है. जैसे आगरे का पेठा, वाराणसी और कांजीवरम की साड़ियाँ और कश्मीर का केसर इत्यादि.

इस प्रकार GI टैग, कृषि, प्राकृतिक, मशीनरी और मिठाई आदि से संबंधित उत्पादों को किसी क्षेत्र विशेष (देश, प्रदेश या टाउन या गाँव) के किसी व्यक्ति, व्यक्तियों के समूह या संगठन को दिया जाता है.

यह टैग 2003 से दिया जा रहा है और इसे प्राप्त करने वाला पहला उत्पाद दार्जिलिंग की चाय थी लेकिन अब तक 360 से अधिक उत्पादों को GI टैग दिया जा चुका है.

तेलिया रुमाल का इतिहास (History of Telia Rumal)

इस रूमाल का इतिहास काफी पुराना है. इसे हैदराबाद के निज़ाम के दरबार में अधिकारियों द्वारा पगड़ी के रूप में पहना जाता था. इसके अलावा राजघरानों की राजकुमारियां भी इसे पर्दे के रूप में इस्तेमाल करतीं थीं.

इसे अरब देशों के व्यापारी भी अपने सिर पर रखते थे और आज भी इसे अजमेर की दरगाह पर चढ़ाया जाता है.

तेलंगाना के पुत्तापका तेलिया रूमाल के बारे में  (About Telia Rumal)

यह रूमाल तेलंगाना के पुत्तापक्का गाँव में बनाया जाता है. इसे पहले केवल 20 परिवारों द्वारा बनाया जाता था लेकिन अब इसे लगभग तेलंगाना के 800 परिवार बनाते हैं.
इसको बनाने में मुख्यतः सिर्फ तीन रंगों का उपयोग किया जाता है. ये हैं लाल, काला और सफ़ेद. हालाँकि अब इसमें अन्य कलर का उपयोग भी किया जाने अलग है.
इसे बनाने में ‘टाई और डाई’ तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है जो कि इसे सबसे अलग बनाता है.

यह तेलिया रुमाल इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसे बनाने में एक विशेष तेल का इस्तेमाल किया जाता है जिसके कारण यह रुमाल नर्म रहता है. इसे कारीगरों द्वारा हथकरघे की मदद से बनाया जाता है इसलिए यह काफी मेहनत लगने जके कारण महंगा होता है और इसे साड़ी और साफा के रूप में पहनना स्टेटस सिंबल होता है.

तेलिया रुमाल को GI टैग मिला (Puttapaka Telia Rumal’ gets GI tag)

इस तेलिया रुमाल का GI टैग, The consortium of Puttapakka Handloom cluster (IHDS) को दिया गया है. इसने 2017 में GI टैग लेने के लिए एप्लाई किया था और टेक्सटाइल केटेगरी के तहत इसे यह GI टैग मिला है.

अब इस नाम का इस्तेमाल किसी और जगह और प्रदेश का उत्पादक नहीं कर सकता है. हालाँकि बनारस में इस तेलिया रुमाल को उसी तकनीकी से बनाया जा सकता है जिससे तेलंगाना में बनाया गया है लेकिन इसका नाम तेलिया रुमाल नहीं रखा जा सकता है क्योंकि यह अधिकार सिर्फ तेलंगाना राज्य के पुत्तापका गाँव के लोग ही कर सकते हैं.

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