रेगिस्तान का वह पेड़, जिसे बचाने के लिए बिश्नोई समाज के 363 लोगों ने दिया था बलिदान
क्या आप राजस्थान की उस घटना के बारे में जानते हैं, जो इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों के साथ दर्ज है। यह वह घटना है, जिसमें पर्यावरण के प्रति बिश्नोई समाज का समर्पण देखने को मिलता है। समाज के लोगों द्वारा पेड़ों को बचाने के लिए अपनी जान की कीमत तक लगानी पड़ी, जिसमें महिलाओं से लेकर बच्चे व पुरुष भी पीछे नहीं रहे। क्या थी वह पूरी घटना, जानने के लिए यह पूरा लेख पढ़ें।
आपने साल 1970 के उत्तराखंड में हुए चिपको आंदोलन के बारे में सुना ही होगा। हालांकि, क्या आप जानते हैं कि कुछ इसी तरह की घटना चिपको आंदोलन से 245 साल पहले 1730 में हो गई थी। राजस्थान की यह घटना बिश्नोई समाज से जुड़ी है, जिसमें 363 लोगों ने रेगिस्तान के पेड़ को बचाने के लिए अपने प्राणों को आहूति दे दी थी।
खास बात यह है कि इस घटना में महिलाओं से लेकर बच्चे व पुरुषों ने पेड़ों को बचाने के लिए आवाज उठाई थी और पेड़ों से गले लगकर अपने सिर कटवा दिए थे। इतिहास के पन्नों में यह घटना स्वर्ण अक्षरों के साथ दर्ज है। कुछ लोगों का यह भी मत है कि उत्तराखंड का चिपको आंदोलन राजस्थान की इस घटना से ही प्रेरित था। क्या थी यह पूरी घटना, जानने के लिए यह पूरा लेख पढ़ें।
महाराजा ने दिया पेड़ कटवाने का आदेश
The Fissured Land: An Ecological History of India के लेखक रामचंद्र गुहा और माधव गाडगिल ने अपनी किताब में इस घटना का जिक्र किया है। करीब 350 साल पहले जोधपुर के महाराजा अभय सिंह अपना महल बनवा रहे थे, जिसके लिए चूना भट्टियों को लगाया गया था। इन भट्टियों में ईंधन के लिए लकड़ियों की आवश्यकता थी। इसके लिए महाराजा ने अपने एक मंत्री गिरिधर भंडारी को पेड़ों का काटने के लिए आदेश दिया।
इस गांव में झेलना पड़ा विरोध
शाही आदेश के बाद महाराजा की सेना ने जोधपुर से 25 किलोमीटर दूर लूनी नदी के किनारे बसे बिश्नोई गांव का चुनाव किया, जहां बड़ी संख्या में खेजरी के वृक्ष मौजूद थे। हालांकि, वे यहां पहुंचे, तो उन्हें अमृता देवी और उनकी दो बेटियों का विरोध झेलना पड़ा।
क्योंकि, अमृता देवी और उनकी दो बेटियां पेड़ों को बचाने के लिए पेड़ों से चिपक गई थी। इसके बाद भी सेनापती नहीं रूका और कुल्हाड़ी चलाने का आदेश दिया। ऐसे में अमृता देवी और उनकी दो बेटियां का सिर काट दिया गया। हालांकि, उन्हें मरते-मरते कहा कि ‘एक कटा हुआ सिर, एक कटे हुए पेड़ से बहुत सस्ता है’।
बिश्नोई समाज के 363 लोगों ने दिया बलिदान
अमृता देवी के बलिदान ने बिश्नोई समाज के अन्य लोगों को प्रभावित किया और अन्य महिलाएं, बच्चे और पुरुष पेड़ों से आकर चिपक गए। हालांकि, सेनापती तब भी नहीं रूका और एक के बाद एक सिर कटते चले गए। इस प्रकार अमृता देवी समेत कुल 363 लोगों ने पेड़ बचाने के लिए अपने सिर कटवा दिए।
तांब्रपत्र में लिखकर रूकवाया नरसंहार
बिश्नोई गांव की घटना जोधपुर के महाराज अभय सिंह तक पहुंची, तो उन्होंने तांब्रपत्र लिखकर इस क्षेत्र को संरक्षित घोषित किया और यहां किसी भी प्रकार के कटाई और शिकार पर रोक लगा दी, जिसके बाद बिश्नोई समाज के पर्यावरण के प्रति उनके प्रेम की जीत हुई।
खेजरी वृक्ष से जुड़ी घटना होने के कारण इस गांव का नाम खेजरली पड़ गया। आपको बता दें कि खेजरी वृक्ष सूखे क्षेत्र में पाया जाता है और यह मिट्टी की गुणवत्ता के लिए भी जाना जाता है। साथ ही, यह चारा भी उपलब्ध करवाता है। यही वजह है कि इसे थार के रेगिस्तान के में आसानी से देखा जा सकता है।
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