क्यों और कब हुआ था पूना पैक्ट, यहां जानें

Jun 21, 2024, 16:20 IST

सांप्रदायिक निर्णय के तहत ब्रिटिश भारत में अगड़ी जातियों, निचली जातियों, मुसलमानों, बौद्धों, सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों, यूरोपीय लोगों और अछूतों के लिए पृथक निर्वाचिका देने का प्रावधान था। इसे 'मैकडोनाल्ड अवॉर्ड' के नाम से भी जाना जाता है। भारत में लगभग हर जगह सामूहिक बैठकें हुईं, अलग-अलग विचारधारा के राजनीतिक नेता, जैसे मदन मोहन मालवीय, बीआर अंबेडकर और एमसी राजा सक्रिय हुए। अंततः वे एक समझौते पर पहुंचने में सफल हुए, जिसे 'पूना पैक्ट' के नाम से जाना जाता है।

क्यों और कब हुआ पूना पैक्ट
क्यों और कब हुआ पूना पैक्ट

16 अगस्त 1932 को मैकडोनाल्ड ने अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के प्रस्ताव की घोषणा की, जिसे सांप्रदायिक पुरस्कार के रूप में जाना जाता है, जिसमें सांप्रदायिक निर्वाचन क्षेत्र की सिफारिश की गई थी। इसे 'मैकडोनाल्ड अवॉर्ड' के नाम से भी जाना जाता है। भारत में लगभग हर जगह सामूहिक बैठकें हुईं, अलग-अलग विचारधारा के राजनीतिक नेता, जैसे मदन मोहन मालवीय, बीआर अंबेडकर और एमसी राजा सक्रिय हुए। अंततः वे एक समझौते पर पहुंचने में सफल हुए, जिसे 'पूना पैक्ट' के नाम से जाना जाता है। ऐसे में इस लेख के माध्यम से हम पूना पैक्ट के आधार को समझेंगे।

सांप्रदायिक पुरस्कार (16 अगस्त 1932)

16 अगस्त 1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने ब्रिटिश भारत में अगड़ी जातियों, निचली जातियों, मुसलमानों, बौद्धों, सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों, यूरोपीय लोगों और अछूतों आदि के लिए पृथक निर्वाचिका देने की घोषणा की थी।

पूना समझौता (24 सितम्बर 1932 ई.)

इस समझौते पर डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर और महात्मा गांधी के बीच पुणे के यरवदा सेंट्रल जेल में सहमति हुई थी। साथ ही समझौते को सरकार द्वारा सांप्रदायिक पंचाट में संशोधन के रूप में मंजूरी दे दी गई थी।

संधि के प्रावधान:

-इस समझौते ने दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचिका को त्याग दिया। लेकिन, प्रांतीय विधानमंडलों में दलित वर्गों के लिए आरक्षित सीटें 71 से बढ़ाकर 147 कर दी गईं तथा केन्द्रीय विधानमंडल में कुल सीटों का 18 प्रतिशत कर दिया गया।

-सीटों के लिए चुनाव संयुक्त निर्वाचक मंडल द्वारा होगा, तथापि, निम्नलिखित प्रक्रिया के अधीन: किसी निर्वाचन क्षेत्र की सामान्य मतदाता सूची में पंजीकृत दलित वर्गों के सभी सदस्य एक निर्वाचक मंडल का गठन करेंगे, जो एकल मत की विधि द्वारा ऐसे प्रत्येक आरक्षित सीट के लिए दलित वर्गों से संबंधित चार उम्मीदवारों के एक पैनल का चुनाव करेगा तथा ऐसे प्राथमिक चुनावों में सबसे अधिक मत प्राप्त करने वाले चार व्यक्ति सामान्य निर्वाचक मंडल द्वारा चुनाव के लिए उम्मीदवार होंगे।

-जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, चुनाव के लिए उम्मीदवारों के पैनल के लिए प्राथमिक चुनाव की प्रणाली पहले दस वर्षों के बाद समाप्त हो जाएगी, जब तक कि इसे आपसी समझौते से पहले समाप्त नहीं कर दिया जाता।

-आरक्षित सीटों द्वारा दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व की प्रणाली तब तक जारी रहेगी, जब तक कि संबंधित समुदायों के बीच आपसी समझौते से अन्यथा निर्धारित न हो जाए।

-दलित वर्गों का मताधिकार लोथियन समिति (भारतीय मताधिकार समिति) की रिपोर्ट में बताए अनुसार होगा।

-स्थानीय निकायों के किसी चुनाव या सार्वजनिक सेवाओं में नियुक्ति के संबंध में दलित वर्गों का सदस्य होने के आधार पर किसी व्यक्ति पर कोई निर्योग्यता नहीं लगाई जाएगी। इन मामलों में दलित वर्गों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा।

-प्रत्येक प्रांत में शिक्षा अनुदान में से दलित वर्गों के सदस्यों को शिक्षा सुविधाएं प्रदान करने के लिए पर्याप्त राशि निर्धारित की जाएगी।

Kishan Kumar
Kishan Kumar

Senior content writer

A seasoned journalist with over 7 years of extensive experience across both print and digital media, skilled in crafting engaging and informative multimedia content for diverse audiences. His expertise lies in transforming complex ideas into clear, compelling narratives that resonate with readers across various platforms. At Jagran Josh, Kishan works as a Senior Content Writer (Multimedia Producer) in the GK section. He can be reached at Kishan.kumar@jagrannewmedia.com
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