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बिहार का प्राचीन इतिहास

बिहार का प्राचीन इतिहास का विस्तार मानव सभ्यता के आरंभ तक है। साथ ही यह सनातन धर्म के आगमन संबंधी मिथकों और किंवदंतियों से भी संबद्ध है। यहां, हम 'प्राचीन बिहार के इतिहास' पर पूर्ण अध्ययन सामग्री दे रहे हैं जो उम्मीदवारों को बीपीएससी और अन्य राज्य स्तर की परीक्षाओं जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होने की राह को आसान कर देगा।
Dec 6, 2018 17:27 IST
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Ancient History of Bihar HN
Ancient History of Bihar HN

बिहार का प्राचीन इतिहास का विस्तार मानव सभ्यता के आरंभ तक है। साथ ही यह सनातन धर्म के आगमन संबंधी मिथकों और किंवदंतियों से भी संबद्ध है।  यह शक्तिशाली साम्राज्य का केंद्र था। सक्षम साम्राज्यों के संरक्षण में यह हजारों वर्षों तक शिक्षा का सांस्कृतिक केंद्र रहा। शब्द 'बिहार' 'विहार' से बना है जिसका अर्थ है बौद्ध भिक्षुओं के आराम करने का स्थान लेकिन 12वीं सदी के मुस्लिम शासकों ने इस स्थान को 'बिहार' कहना शुरु कर दिया था।

बिहार का इतिहास जानने का विभिन्न स्रोत

पुरातात्विक साक्ष्य

1. पुरापाषाण काल  (मुंगेर और नालंदा)।

2. मध्यपाषाण काल (हजारीबाग, रांची, सिंहभूम और संथाल परगना)।

3. नवपाषाण काल (सारण में चिरांद और वैशाली में चेचर)।

4. कुम्हरार (पटना) का अस्सी खम्भों वाले हॉल का भग्नावशेष।

5. लौरिया नंदनगढ़, रामपुरवा (पश्चिमी चम्पारण) और लौरिया अरेराज (पूर्वी चम्पारण) का मौर्य स्तंभलेख।

6. वैशाली से प्राप्त गुप्त कालीन मुहर और सिक्के।

साहित्यिक स्रोत

1. शतपथ ब्राह्मण के अनुसार आर्य सभ्यता गंगा के दोनों ओर फैला हुआ था।

2. अथर्ववेद और पंचवीश ब्राह्मण के अनुसार प्राचीन बिहार में तपस्वी के रूप में भटकने वाले को "वर्त्यस" कहा जाता था।

3. ऋग्वेद के अनुसार इस क्षेत्र के अछूत लोगों को "कीकैत" कहा जाता था।

4. पुराण, रामायण और महाभारत।

5. बौद्ध साहित्य जैसे अभिधम्मपिटक, विनयपिटक और सुतपिटक।

6. अंगुतर निकाय में महाजनपद के बारे में उल्लेख किया है।

7. दीर्घ निकाय, दीपवंश और महावंश

8. जन साहित्य जैसे भद्रबाहू का कल्पसूत्र, परिशिष्ट वर्णन और वसुदेवचरित में चंद्रगुप्त मौर्य के प्रारंभिक इतिहास का वर्णन किया गया है।

9. मेगस्थनीज चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया था।

10. फाहियान 5 वीं शताब्दी ईस्वी में भारत का दौरा किया था और उसने मगध के बारे में वर्णन किया है।

11. ह्वेनसांग राजा हर्ष के दरबार में 637 ईस्वी में आया था और उसने नालंदा के मठों का उल्लेख किया है।

12. एक चीनी यात्री इत्सिंग ने नालंदा और उसके आस-पास के क्षेत्र का वर्णन किया है।

बिहार में आर्यों का आगमन

1. पूर्वी भारत की ओर आर्यों ने उत्तर– वैदिक काल (1000-600 ई.पू.) में बढ़ना शुरु किया था।

2. शतपथ ब्राह्मण ने आर्यों के आगमन और विस्तार का उल्लेख किया है।

3. वराह पुराण में किकत को अशुभ और गया, पुनपुन और राजगीर को शुभ स्थान बताया गया है।

महाजनपद

बौद्ध और जैन साहित्य में इस बात का उल्लेख मिलता है कि 6ठी शताब्दी में भारत में कई छोटे राज्य थे जिन पर मगध का आधिपत्य था। 500 ई.पू. में सोलह राज्यों और गणराज्यों का उद्भव हुआ। इन्हें महाजनपद के नाम से जाना जाता है।

1. अंग: बिहार में भागलपुर और मुंगेर के आधुनिक प्रमंडल एवं झारखंड के साहिबगंज और गोड्डा जिलों के कुछ हिस्से।  

2. मगध: पटना और गया के प्रमंडलों वाला राज्य जिसकी आरंभिक राजधानी राजगृह या गिरिवराज थी।  

3. वज्जि: आठ कबीलाई गणराज्यों का संघ, बिहार में गंगा नदी के उत्तर में स्थित था। राजधानी थी वैशाली।     

4. मल्ल: यह भी एक गणराज्य संघ था जिसमें आधुनिक पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया, बस्ती, गोरखपुर और सिद्धार्थनगर जिले आते थे। इसकी दो राजधानी थी– कुसीनारा और पावा।

5. काशी:  वर्तमान में बनारस का इलाका, राजधानी वराणसी थी।

6. कोशल: वर्तमान का फैजाबाद, गोंडा, बहराइच आदि जिले आते थे। राजधानी श्रावस्ती थी।

7. वत्स: वर्तमान समय के इलाहाबाद और मिर्जापुर आदि जिले इसके अंतर्गत आते थे। राजधानी थी कौशाम्बी।  

8. छेदी: आधुनिक बुंदेलखंड, राजधानी शुक्तिमति। 

9. कुरु: यमुना नदी के पश्चिम में पड़ने वाले इलाके हरियाणा और दिल्ली। राजधानी इंद्रप्रस्थ (दिल्ली)।

10. पांचाल: पश्चिमी उत्तर प्रदेश से यमुना नदी के पूर्व के इलाके। राजधानी अहिछत्र।

11. सुरसेन: ब्रज–मंडल को कवर करता है, राजधानी मथुरा में थी।

12. मत्स्य: यह राजस्थान के अलवर, भरतपुर और जयपुर इलाकों को कवर करता है।  

13. अवंती: आधुनिक मालवा, उज्जैनी और महिष्मति में राजधानी।   

14. अश्माका: नर्मदा और गोदावरी नदियों के बीच, राजधानी थी पोतना।   

15. गांधार: इसके अंतर्गत पाकिस्तान के पश्चिमी इलाके और पूर्वी अफगानिस्तान के इलाके आते थे। राजधानी तक्षशिला और पुष्कलवति में थी।

16. कंबोज: इसकी पहचान आधुनिक पाकिस्तान के हजारा जिले के तौर पर की गई है। 

बौद्ध ध्रर्म  और बिहार

बिहार बौद्ध धर्म का जन्मस्थल है क्योंकि यही वह स्थान है जहां ज्ञान का दिव्य प्रकाश गौतम बुद्ध पर पड़ा था। यह वह स्थान था जहां बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी, उन्होंने अपना पहला उपदेश यही दिया था, उस उपदेश को “ धर्म चक्र प्रवर्तन”, कहा जाता है और यहीं पर उन्होंने अपने “परिनिर्वाण” की घोषणा भी की थी।

बौद्ध साहित्य

1. विनय पिटक: इसमें भिक्षुओं और मठवासिनियों के लिए नियम और आचरण दिए गए हैं।

2. सुत्त पिटक: यह बुद्ध के लघु उपदेशों का संग्रह है जिसे 5 निकायों में विभाजित किया गया है।

3. अभिधम्म पिटक : इसमें बुद्ध के सिद्धांतों यानि धार्मिक प्रवचन की मीमांसा दी गई है।

4. जातक: यह बुद्ध के पिछले जन्मों से संबंधित लघु कहानियों का संग्रह है। 

5. मिलिन्दपान्हो: इसमें यूनान के राजा मेनांदर और बौद्ध संत नागसेना के बीच हुई बातचीत दी गई है। 

नोट: त्रिपिटक आखिरकार चौथे बौद्ध परिषद के दौरान संकलित किए गए और ये पाली भाषा में लिखे गए थे। 

चार सत्य

1. सर्वम दुक्खम: जीवन दुखों से भरा है। 

2. दुख समुद्र: इच्छा पुनर्जन्म और दुख का कारण है।

3. दुख निरोध: इच्छा पर विजय प्राप्त कर दुख और पुनर्जन्म से मुक्ति पाई जा कती है।    

4. गामिनी प्रतिपद: निर्वाण या मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है यानि मनुष्य अष्ट मार्ग, अष्टंगिका मार्ग' पर चल कर जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो सकता है।  

अष्टांगिक मार्ग

1. सम्यक दृष्टि — पूर्ण या सटीक दृष्टि

2. सम्यक संकल्प — मानसिक और नैतिक विकास की प्रतिज्ञा

3. सम्यक वाक  —हानिकारक बातें और झूठ न बोलना

4. सम्यक कर्म  — हानिकारक कार्य न करना

5. सम्यक जीविका — स्पष्ट या अस्पष्ट रूप से हानिकारक व्यापार न करना

6. सम्यक प्रयास  — खुद को सुधारने की कोशिश

7. सम्यक स्मृति — स्पष्ट ज्ञान से देखने की मानसिक योग्यता प्राप्त करने की कोशिश

8. सम्यक समाधि — निर्वाण पाना

नोट: सम्यक शब्द का अर्थ है 'उचित', 'पूर्ण', 'पूरी तरह से', 'अभिन्न', ' पूरा', और 'उत्तम'।

जैन धर्म और बिहार

जैन धर्म वर्धमान महावीर के उद्भव के साथ अस्तित्व में आया। जैन साहित्य के अनुसार वे 24वें तीर्थंकर थे। 30 वर्ष की उम्र में, मोक्ष की खोज में उन्होंने घर का त्याग कर दिया था और उन्होंने 'निर्ग्रंथ' कहलाने वाले तपस्वी समूह की प्रथाओं का पालन किया था। जैनों के मूल साहित्य को 'पूर्वास' कहा जाता है और ये संख्या में 14 हैं। जैन तीर्थंकरों की सूची नीचे दी गई है:

जैन धर्म के तीर्थंकर

तीर्थंकर

प्रतीक

निर्वाण स्थल

भगवान ऋषभ

वृष/ सांड

अष्टपद (कैलाश)

अजितनाथ

हाथी

समेत शिखर

संभवनाथ

घोड़ा

समेत शिखर

अभिनंदननाथ

बंदर

समेत शिखर

सुमतिनाथ

लाल हंस

समेत शिखर

पद्मप्रभा

कमल

समेत शिखर

सुपार्श्वनाथ

स्वास्तिक

समेत शिखर

चंद्रप्रभा

चंद्रमा

समेत शिखर

पुष्पदंत

मगरमच्छ

समेत शिखर

शीतलनाथ

कल्पवृक्ष

समेत शिखर

श्रेयांसनाथ

गैंडा

समेत शिखर

वसुपुज्य

मादा मैंस

चंपापुरी

विमलनाथ

सूअर

समेत शिखर

अनंतनाथ

साही

समेत शिखर

धर्मनाथ

वज्र

समेत शिखर

शांतिनाथ

हिरण

समेत शिखर

कुंथुनाथ

बकरी

समेत शिखर

अरनाथ

मछली

समेत शिखर

मल्लिनाथ

कलश

समेत शिखर

मुनिसुव्रत

कछुआ

समेत शिखर

नामी नाथ

नीले– जल की कुमुद

समेत शिखर

नेमिनाथ

शंख 

गिरनार पर्वत

पार्श्व

सांप

समेत शिखर

महावीर

सिंह

पावा पुरी

जैनधर्म के सिद्धांत

1. सिद्धांत पांच अवधारणाओं के इर्द–गिर्द घूमता है: सत्य; अहिंसा, अपरीग्रह, अस्त, ब्रह्मचर्य।

2. गंभीर तपस्या और त्रिरत्नों के अभ्यास के माध्यम से आत्मा की शुद्धि द्वारा मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। 

3. जैन धर्म के नयावाद के अनुसार वास्तविकता तक अलग– अलग दृष्टिकोण से पहुंचा जा सकता है इसलिए ये संबद्ध होते हैं और ज्ञान पूर्ण नहीं हो सकता।   

बृहदरथ राजवंश

मगध के आरंभिक ज्ञात राजाओं में था बृहदरथ और उसके नाम का उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। महाभारत और पुराणों के अनुसार, बृहदरथ छेदी के कुरु राजा वसु के सबसे छोटे बेटे थे। इस राजवंश का प्रख्यात राजा हुआ जरासंघ और वह बृहदरथ का बेटा था। 

हर्यंक राजवंश

इस राजवंश के संस्थापक थे बिम्बिसार। उन्होंने वैवाहिक गठबंधनों के जरिए अपने साम्राज्य का विस्तार किया था। उनकी पहली पत्नी कोशलदेवी कौशल की राजकुमारी और प्रसेनजित की बहन थीं। दूसरी पत्नी छेलना, लिच्छवी की राजकुमारी थी और तीसरी पत्नी केश्मा पंजाब के मद्र कबीले की राजकुमारी।

अजातशत्रु ने बिम्बिसार का स्थान लिया था। इसके शासन काल के दौरान ही महात्मा बुद्ध ने 'महापरिनिर्वाण' प्राप्त किया और भगवान महावीर की पावापुरी में मृत्यु हुई। उसके संरक्षण में ही पहला बौद्ध परिषद आयोजित किया गया था। उदियन ने अजातशत्रु से गद्दी छीनी थी। उसने पाटलिपुत्र शहर की स्थापना की और उसे राजधानी बनाया

शिशुनाग राजवंश

इस राजवंश के संस्थापक थे शिशुनाग। उनके शासनकाल में मगध की दो राजधानी थी– राजगीर और वैशाली। दूसरा बौद्ध परिषद कालाशोक के संरक्षण में आयोजित किया गया था।

नंद राजवंश

महापद्मानंद ने शिशुनाग वंश के अंतिम शासक नंदीवर्धन की हत्या कर इस राजवंश की स्थापना की थी। पुराणों में इन्हें महापद्म या महापद्मपति लिखा गया है। महाबोधिवमसा में इन्हें उग्रसेन भी कहा गया है। धनानंद नंद वंश का अंतिम शासक था और मगध का समकालीन भी।

मौर्य साम्राज्य

मौर्य काल मानव जाति के अस्तित्व के प्रत्येक क्षेत्र जैसे सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक या आर्थिक, में विकास का साक्षी रहा। प्राचीन भारत का यह भौगोलिक रूप से व्यापक, शक्तिशाली और राजनीतिक सैन्य साम्राज्य था। इस साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी। चंद्रगुप्त मौर्य, बिन्दुसार और अशोक इस साम्राज्य के महान शासक हुए।    

मौर्य समाज

1. मेगास्थनीज ने मौर्य समाज को सात जातियों में बांटा है– दार्शनिक, किसान, सैनिक, चरवाहा, कारीगर, मजिस्ट्रेट और पार्षद। उन्होंने कहा है कि दास्त्व का मौर्य वंश में अस्तित्व नहीं था लेकिन अन्य भारतीय स्रोत इस बात सहमत नहीं दिखते। 

2. कौटिल्य ने वैश्य और शूद्रों को सेना में भर्ती करने की सिफारिश की थी लेकिन उनका वास्तविक नामांकन बेहद संदिग्ध है। वह चार जातियों के अस्तित्व की बात कहते हैं।

3. शूद्रों की स्थिति में सुधार हुआ था। वे काफी हद तक आज के किसानों और घरेलू नौकरों जैसे थे। वे जमीन खरीद सकते थे।

उत्तर– मौर्य वंश

शुंग वंश

इस राजवंश के संस्थापक थे पुष्यमित्र शुंग। दो अश्वमेघ यज्ञ कराए गए थे जिसकी पुष्टि अयोध्या के शिलालेख घनदेव से होती है। महान संस्कृत आचार्य पतंजलि मुख्य पुजारी थे।  पुष्यमित्र के बाद अग्निमित्र ने गद्दी संभाली। वे कालिदास के नाटक 'माल्विकाग्निमित्रम' के नायक थे। पुराणों के अनुसार, देवभूति शुंग राजवंश के 10वें और अंतिम शासक थे।

 कण्व राजवंश

राजवंश के संस्थापक थे वसुदेव। वंश के अंतिम शासक थे सुशर्मन। सतवाहन राजवंश के शासकों के सत्ता में आने के कारण इस राजवंश का अंत हो गया था।

कुषाण राजवंश

कुषाण युग के अवशेष मगध के इलाकों से प्राप्त हुए हैं। उन्होंने इस इलाके में पहली शताब्दी ई. के आसपास अपना अभियान शुरु किया था। कुषाण शासक कनिष्क के पाटलिपुत्र पर आक्रमण करने और अपने साथ प्रख्यात बौद्ध भिक्षु अश्वघोष को ले जाने के सबूत हैं।   

गुप्त साम्राज्य

यह राजवंश प्राचीन भारत में दूसरे साम्राज्य की स्थापना का प्रतीक है। गुप्त वंश के शासकों ने एकीकृत प्रशासन के तहत भारत के अधिकांश हिस्सों पर कब्जा किया था। गुप्त वंश और मौर्य वंश के प्रशासन में यह अंतर था कि मौर्यों के शासन में  प्रशासन और सत्ता केंद्रीकृत थी लेकिन गुप्त के शासनकाल में प्रशासन और सत्ता विकेंद्रीकृत। शिलालेख से पता चलता है कि श्री गुप्त पहले राजा थे।

गुप्त राजाओं द्वारा धारण की गई उपाधियों की सूची

पाल साम्राज्य के दौरान बिहार

पाल साम्राज्य प्राचीन भारत में बौद्धों की सर्वोच्च शक्ति थी। 'पाल' शब्द का अर्थ होता है संरक्षक और सभी पाल सम्राटों के नाम के आखिर में इसका उपयोग किया जाता था।  पाल बौद्ध धर्म के महायान और तंत्रयान के अनुयायी थे। इस राजवंश के पहले शासक थे गोपाल।  

पाल के तांबा के प्लेट पर उत्कीर्ण अभिलेख के अनुसार देवपाल ने उकाल को सत्ता से बाहर कर दिया, प्रग्योतिशा (असम) पर विजय प्राप्त की, हूणों के गौरव को समाप्त किया और प्रतिहारों, गुर्जर एवं द्रविड़ों के भगवान का अपमान किया। पालों ने कई मंदिरों का निर्माण करवाया, कई प्रकार के कलात्मक कार्य किए साथ ही नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों के हित में काम किया।

प्राचीन भारत का इतिहास: एक समग्र अध्ययन सामग्री