हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने 'मन की बात' कार्यक्रम में घरेलू खिलौनों को बढ़ावा देने पर ज़ोर देते हुए चन्नापटना खिलौनों का ज़िक्र किया था। कोविड-19 महामारी के कारण बाकी उद्योग प्रसिद्ध चन्नापटना खिलौनों के उद्योग को भारी नुकसान हुआ है।
महामारी के कारण सिर्फ 2000 से 2500 कारीगर और मज़दूर ही खिलौने बनाने के काम में जुटे हुए हैं, जबकि महामारी से पहले 9000 से 10,000 कारीगर और मज़दूर खिलौने बना रहे थे।
चन्नापटना खिलौनों की ख़ासियत
चन्नापटना खिलौने एक प्रकार के लकड़ी के खिलौने हैं। ये खिलौने हल्के और कठोर होते हैं। पुराने ज़माने में इन खिलौनों को Ivory wood से बनाकर इनपर पॉलिश की जाती थी। मौजूदा दौर में इन खिलौनों का निर्माण सागौन, गूलर, देवदार, रबरवुड, पाइनवुड आदि की लकड़ियों से किया जाता है। इन खिलौनों के GI Tag मिला हुआ है और इनका पुनचर्क्रण भी किया जा सकता है।
आपको जानकर हैरानी होगी कि इन खिलौनों को बनाने में थोड़ी सी भी लकड़ी बर्बाद नहीं होती है और बची हुई लकड़ी को अन्य खिलौने बनाने में या हवन सामग्री के उद्दयोग में इस्तेमाल किया जाता है। सिर्फ भारत में ही नहीं ब्लकि यूरोप और अमेरिका में भी इन खिलौनों का निर्यात किया जाता है।
चन्नापटना खिलौने कहां बनाए जाते हैं?
चन्नापटना खिलौनों को कर्नाटक के चन्नपटना शहर में बनाया जाता है। इस शहर को 'कर्नाटक का खिलौना शहर' भी कहा जाता है। आपको बता दें कि भारत का पहला शिल्प पार्क भी यहीं स्थित है। इस शहर के निवासियों की जीविका का मुख्य स्रोत यहां के खिलौने ही हैं।
चन्नापटना खिलौनों का इतिहास
चन्नापटना खिलौनों का संबंध टीपू सुल्तान के शासन से है। ऐसा कहा जैतै है कि सुल्तान को फारस से एक लकड़ी का खिलौना भेंट स्वरूप मिला था। भेंट में मिले इस उपहार से सुल्तान इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने फारस से कारीगरों को बुलवाकर अपने वहां के कारीगरों को कला सिखवाई। अत: जो कारीगर इन खिलौनों को बनाना सीख गए वो चन्नापटना में ही रह कर खिलौने बनाने लगे।
साल 2015 में गणतंत्र दिवस के मौके पर कर्नाटक में एक झांकी के दौरान इन खिलौनों को दिखाया गया था। बेस्ट झांकी के पुरस्कार में इस झांकी को तीसरा स्थान मिला था।
Comments
All Comments (0)
Join the conversation