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काम करने वाले जोड़ों के लिए एक बच्चे का निर्णय सही या गलत

अक्सर दो कार्यरत पेयर के शादी जैसे बंधन में बंधने के दो या तीन साल के बाद घर में किसी तीसरे इंसान के आने की कवायद से यह पूछा जाने लगता है कि तब और बताइए नयी खुशखबरी कब दे रहे हैं ?

Oct 27, 2017 09:49 IST
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SINGLE CHILD FAMILY
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अक्सर दो कार्यरत पेयर के शादी जैसे बंधन में बंधने के दो या तीन साल के बाद घर में किसी तीसरे इंसान के आने की कवायद से यह पूछा जाने लगता है कि तब और बताइए नयी खुशखबरी कब दे रहे हैं ? इस तरह के सवालों से अधिकतर पेयर सामाजिक दबाव में आकर या फिर परिवार के प्रेशर में एक बच्चा पैदा करते हैं. लेकिन पहले बच्चे के दो तीन साल बाद पुनः वही सवाल दूसरे तरीके से दुहारते हुए पूछा जाता है कि तब दूसरी संतान कब ? लेकिन आजकल बढ़ती आर्थिक जिम्मेदारियों तथा व्यस्ततम जीवन शैली के कारण कुछ युवा जोड़ियाँ पारिवारिक और सामाजिक दबाव के बावजूद सिंगल चाइल्ड के कांसेप्ट को स्वीकार करते हुए उस पर अमल कर रही हैं.

यूँ तो यह एक निजी निर्णय है तथा इस विचारधारा को लेकर सबकी अलग राय हो सकती है तथा सबके अपने अलग अलग तर्क हो सकते हैं और उन तर्कों की अपनी प्रासंगिकता है.

वस्तुतः परिवार में विस्तार का निर्णय जीवन का एक अहम् निर्णय हैं. बच्चे पैदा करना बड़ी बात नहीं है. बड़ी बात है एक जिम्मेदार माता पिता के रूप में अपने बच्चे को अच्छी परवरिश देना. आपको समाज में कई ऐसे किस्से देखने को मिलते हैं जहां कार्यरत युवा जोड़ियाँ आर्थिक और मानसिक रूप से तैयार नहीं होने के बावजूद भी परिवार के दबाव में आकर बच्चे पैदा कर लेते हैं और जब उनके सही परवरिश की बात आती है तो  आर्थिक तंगी का रोना रोकर अपने तथा बच्चे दोनों के साथ नाइंसाफी करते हैं. इससे बड़ी मुर्खता का पैमाना क्या हो सकता है जब कोई अपने इन निजी फैसलों में भी औरों का दबाव झेलता है.

आपने अक्सर लोगों को यह भी कहते हुए सुना होगा कि एक बच्चा अच्छा नहीं होता, भाई बहन के अभाव में जिद्दी हो सकता है. उसे पूरी जिन्दगी अकेले रहना पड़ेगा आदि आदि. ध्यान रखिये ऐसा कभी नहीं होता. यह सही है की दो भाई बहन या भाई भाई अपना बचपन साथ बिताते हैं लेकिन बाद में चलाकर ये सारे रिश्ते औपचारिकता मात्र ही रह जाती हैं और उसे अपनी जिन्दगी अपनी प्रतिभा और क्षमता के बल पर ही जीनी होती है. इसलिए दो चार बच्चे पैदा करने की बजाय एक ही बच्चे को ऐसी परवरिश दें कि वह सामाजिक आर्थिक तथा मानसिक रूप से सशक्त तथा आत्मनिर्भर होते हुए समाज और देश के विकास में अपना अमूल्य योगदान दे सके.

 लेकिन आज के दौर में कार्यरत जोड़ियों के लिए एक से अधिक बच्चा पैदा करना कहीं न कहीं बच्चे तथा अपने आप के साथ समझौते की प्रक्रिया को दर्शाता है. लेकिन वहीं अगर जोड़ी का कोई एक सदस्य कार्यरत हो तो यह निर्णय निजी पसंद के आधार पर सही या गलत दोनों हो सकता है. 

 कुछ विशेषज्ञों की राय है कि एकल बच्चे के माता-पिता अपने बच्चे की आर्थिक और मानसिक दोनों रूप से सही परवरिश करने में सक्षम हो सकते हैं जबकि कुछ इसे सिर्फ पसंद का मामला बताते हैं.

लेकिन गौर से देखा जाय तो ऐसे कुछ व्यावहारिक कारण हैं जो एकल बच्चे के निर्णय को सही ठहराते हैं -

1. यह पूरी तरह से माता पिता की इच्छा पर निर्भर करता है

कभी भी इस बात को लेकर परेशान मत होइए कि आपका एकल बच्चे का निर्णय गलत है. यह बात तो पूरी तरह से आपकी क्षमता तथा पसंद पर निर्भर करती है. यदि आप दो बच्चों का बोझ आर्थिक रूप से वहन करने में सक्षम हैं तो अवश्य ही आपका निर्णय सही है लेकिन यदि आप घर वालों के कहने से यह समझकर की जरुरत पड़ने पर घरवाले आपकी मदद करेंगे,तो यह निर्णय आपके हित में नहीं होगा. परवरिश तो किसी तरह हो ही जाएगी लेकिन जब बात क्वालिटी जन्य परवरिश की आएगी तो इसमें आपकी कोई मदद नहीं करेगा, वो आपको स्वयं ही करना होगा और उस समय आप न चाहते हुए भी समझौता करने के लिए मजबूर होंगे जो बच्चे के साथ सरासर नाइंसाफी होगी.

2. अपनी आय का मूल्यांकन करें

बच्चों की परवरिश के मामलों में पारिवारिक आय एक बेंचमार्क है. हमेशा इसी आधार पर यह निर्णय लेना चाहिए. छोटे बच्चों की सही तरह से परवरिश में अतिरिक्त पैसों की जरुरत पड़ती ही पड़ती हैं. इसके अतिरिक्त स्वस्थ्य सम्बन्धी एमरजेंसी के लिए भी पैसों की सख्त जरुरत होती है. साथ ही ज्यों ही आपका बच्चा स्कूल में एडमिशन लेगा आपका खर्चा सीधे तिगुना या फिर चार गुना बढ़ जाएगा. इसलिए आर्थिक स्थिति और बेहतर परवरिश के मामले में एकल बच्चा बेहतर विकल्प साबित होगा.

3. पारिवार के सामजिक, मानसिक और आर्थिक सहयोग का आकलन

हम अक्सर युवा जोड़ी को यह कहते सुनते हैं कि अरे माँ दूसरे बच्चे के लिए जिद कर रही है इसलिए मैं प्लान कर रहा हूँ वर्ना मेरी इच्छा नहीं है. ऐसी  बात बिलकुल समाज से ज्यादा अपने आप को भ्रम में रखने के लिए की जाती है. ध्यान रखिये बच्चे आपकी जिम्मेवारी हैं किसी और के भरोसे उसे पैदा नहीं किया जाना चाहिए. अगर पत्नी पति दोनों कार्यरत हैं तो स्वाभाविक है कि अगर परिवार का सपोर्ट है तो दादा दादी या फिर घर के अन्य सदस्य उसकी देखभाल कर सकते हैं. लेकिन चाहे आप कुछ भी कह लीजिये जिस भावनात्मक तुष्टि की आवश्यक्ता एक बच्चे या शिशु को होती है उसे माँ के अतिरिक्त कोई पूरा नहीं कर सकता चाहे आप लाख दलील दें लें. ये सारे दलील आपकी मज़बूरी विवशता और समझौते की प्रवृति तथा कहीं न कहीं अपने सम्पूर्ण दायित्वों के निर्वाह में असफल होने की प्रवृति को दर्शाता है. माता पिता या घर के बुजुर्गों के सम्मान का मतलब यह नहीं कि उनके हर निर्णय को स्वीकार किया जाय. सबके प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारी को समझते हुए कोई फैसला लीजिये. 

4. बच्चे के भविष्य के लिए योजना बनाएं

अगर माता पिता दोनों कमाते है तो स्वभाविक है कि घर की इनकम कुछ ज्यादा होगी. ऐसे में दो बच्चों के निर्णय की जगह एक ही बच्चे के भविष्य के लिए बेहतर प्लानिंग करें. अगर आप अपने एक बच्चे के भविष्य के लिए सारी योजनायें जैसे जीवन बीमा, बच्चे के लिए शिक्षा की योजना और शादी के लिए बचत की योजना आदि को करने में सक्षम हों तथा उसी अनुपात में दूसरे बच्चे की परवरिश करने में सक्षम हों,तो दो बच्चे का निर्णय आप ले सकते हैं.

5. लोगों की बात में नहीं आए

यह जिंदगी आपकी अपनी है इसे अपने तरीके से जीने की कोशिश कीजिये. हमेशा इस बात को ध्यान में रखिये कि एक आदमी हर किसी को खुश नहीं रख सकता. अगर आप दो बच्चे की योजना बनाते हैं तो अपनी आर्थिक क्षमताओं का आकलन अवश्य करें. दूसरों का देखा देखी या फिर घर वाले ऐसा कह रहे हैं यह सोचकर यह निर्णय कत्तई नहीं लें. कई जोड़ियाँ अपने माता पिता का मन रखने के लिए ऐसा निर्णय लेती  हैं लेकिन जरा सोचिये आप जिस चीज का निर्णय ले रहें हैं वह कोई खिलौना या निर्जीव वस्तु नहीं है जो आप किसी का मन रखने के लिए उसे पैदा करें और बाद में उसे जीवन के हर क्षेत्र में समझौता करने की सीख देते हुए अपनी आर्थिक विवशता को छिपाने की कोशिश करें. ऐसे मामलों में अक्सर लोग वृद्ध माता पिता की जिम्मेदारियों के साथ साथ बच्चों की जिम्मेदारी निभाते वक्त कई तरह की आर्थिक और सामजिक परेशानियों के शिकार होते हैं. इसलिए हमेशा अपने मन के सही निर्णय का साथ दें और तदनुरूप फैसला लें.

इसलिए जब कभी भी इस तरह के संदेहास्पद और डाइलेमा की स्थिति से गुजर रहे हों तो ऊपर की उक्तियों पर ध्यान देते हुए अपनी विचार शक्ति और परिस्थितियों के आधार पर सही निर्णय लें.

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