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भारत में चुनाव सुधार: आवश्यकता और पहलू

Last Updated: Oct 21, 2019, 12:28 IST

भारत में साफ सुथरे लोकतंत्र और स्वच्छ राजनीति को बढ़ावा देने के लिए चुनाव सुधार की बात बहुत लम्बे अरसे से जी जाती रही है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324– 329 चुनाव आयोग और चुनाव सुधार के बारे में बात करते हैं. राजनीति में धनबल के प्रभाव को रोकने के लिए चुनाव आयोग ने लोक सभा में चुनाव खर्च की सीमा Rs.50 70 के बीच और विधान सभा के लिए Rs.20–28 के बीच कर दी है.

भारत में चुनाव सुधार: आवश्यकता और पहलू
भारत में चुनाव सुधार: आवश्यकता और पहलू

निर्वाचन प्रणाली में सुधार को लेकर विरोध और उदासीनता की स्थिति से देश के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी भी हैरान और परेशान हैं। कुरैशी का कहना है कि इलेक्शन रिफॉर्म्स के सुझाव पर एक्शन नहीं होता। सरकार से एक ही जवाब मिलता है कि आम सहमति नहीं बन पा रही है। चिंता की बात यह है कि इससे जनता की निगाह में नेताओं की इमेज निरंतर खराब होती जा रही है।

इलेक्शन भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा जरिया है, चुनाव के दौरान तमाम तरह के अवैध पैसों का लोग चुनाव में इस्तेमाल करते हैं, लेकिन साथ में महंगाई को देखते हुए ये भी आलोचना होती रहती है कि खर्च की लिमिट बढ़ाई जानी चाहिए, अगर आप उस भ्रष्टाचार को रोकना चाहते हैं कि कालेधन का प्रयोग ना हो तो आपको एक रैशनल तरीके से सोचना पड़ेगा, एक तालमेल बनाकर चलना पड़ेगा ।

भारत में चुनाव सुधार के लिए निम्न चार समितियां मुख्य रूप से गठित की गयीं थीं. (Committees for Election Reforms in India)

1. जया प्रकाश नारायण समिति (1974)  

2. तारकुंडे समिति, (1974) 

3. दिनेश गोस्वामी समिति (1990)

4. इंद्रजीत गुप्ता समिति (1998)

भारत में चुनाव सुधार (Election Reforms in India)

हमारे पूर्वजों की आकांक्षाओं को बनाए रखने, संविधान के आदर्शों को पूरा करने और निष्पक्ष चुनाव करा कर सच्चे लोकतंत्र की अक्षरशः भावना को बनाए रखने के लिए चुनाव सुधार आवश्यक हैं। चुनावी सुधारों की प्रक्रिया का मुख्य फोकस लोकतंत्र के मूल अर्थ को व्यापक बनाना, इसे नागरिकों के अधिक अनुकूल बनाना और व्यस्क मताधिकार का अक्षरशः कार्यान्वयन करना है।

चुनावी सुधारों से संबंधित संवैधानिक अनुच्छेद इस प्रकार हैं (Articles related to Election Reforms in India)

1. अनुच्छेद 324– 329 चुनावों और चुनावी सुधारों के बारे में बताता है।
2. अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को दिए गए अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण अधिकारों के बारे में है।

3. अनुच्छेद 325 कहता है कि कोई भी व्यक्ति धर्म, वंश, जाति या लिंग के आधार पर विशेष मतदाता सूची से न बाहर किया जा सकता है या न ही शामिल किए जाने का दावा कर सकता है।

4. अनुच्छेद 326 व्यस्क मताधिकार के आधार पर लोकसभा चुनावों और राज्य विधानसभा चुनावों के बारे में बात करता है।

5. अनुच्छेद 327 विधानमंडल चुनावों के संबंध में प्रावधान बनाने के लिए संसद को शक्ति प्रदान करता है।

6. अनुच्छेद 328 राज्य विधानमंडल के चुनाव के संबंध में प्रावधान बनाने के लिए राज्य विधानमंडल को शक्ति प्रदान करता है।

7. अनुच्छेद 329 चुनावी मामलों से संबंधित अदालतों द्वारा किसी भी हस्तक्षेप करने के लिए अदालत पर बार (वकीलों का समूह) बनाने की शक्ति प्रदान करता है।

चुनाव सुधार के पहलूः

निर्वाचन सुधार के निम्नलिखित पहलू होते हैं–

  • उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि के बारे में पारदर्शिता।  
  • चुनाव प्रक्रिया को बाहुबल और पैसे की शक्ति से मुक्त रखना।
  • व्यापार और राजनीति के बीच सांठगांठ पर रोक लगाना।  
  • वोट डालने के योग्य सभी नागरिकों को एक आरामदायक, दोस्ताना और वोट डालने की सुविधा देता है।
  • मतदाताओं की गोपनीयता कायम रखना।
  • बिना किसी से प्रभावित हुए राजनीतिक दलों का निष्पक्ष पंजीकरण और मान्यता।
  • अनपढ़ मतदाताओं को मतदान सूची से हटाने का समाधान।
  • मीडिया की गैर– पक्षपातपूर्ण भूमिका।  
  • आदर्श आचारसंहिता का कुशलता से लागू करना।  
  • निर्वाचन नामावलियों को व्यवस्थित तरीके से तैयार करना।
  • चुनाव प्रक्रियाओं में तेजी लाना।
  • चुनावी प्रक्रियाओं की तर्कसंगत व्याख्या।

भारत में चुनाव सुधारों की आवश्यकताः (Requirement of the Election Reforms in India )

चुनाव सुधारों की जरूरत मुख्य रूप से दुर्भावनापूर्ण लोगों और बुरी गतिविधियों को दूर करने की वजह से की गई है। इसकी जरूरत की व्याख्या इस प्रकार कर सकते हैं–

  • चुनाव प्रक्रिया को दिन की स्थिति प्रतिबिंबित करनी चाहिए और समकालीन समाज पर उसे थोपा नहीं जाना चाहिए।
  • राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए।
  • सरकारी तंत्र के दुरुपयोग को रोकने के लिए।
  • चुनाव प्रक्रियाओं में पैसे और बाहुबल को हतोत्साहित करने के लिए।
  • चुनाव में अ– गंभीर उम्मीदवारों को हताश करने के लिए।
  • निर्वाचन प्रक्रियाओं को तटस्थ होना चाहिए, किसी भी राजनीतिक दल के लिए पूर्वाग्रहों से मुक्त होना चाहिए।
  • निर्वाचन प्रक्रियाओं के प्रति नागरिकों में विश्वास को बढ़ाने के लिए।
  • चुनाव प्रक्रियाओं में प्रौद्योगिकी का उपयोग करने और आज के समय की पद्धतियों के अनुरूप बनाने के लिए।

राजनीति में धनबल के प्रभाव को रोकने के लिए चुनाव आयोग ने लोक सभा में चुनाव खर्च की सीमा Rs.50 70 के बीच और विधान सभा के लिए Rs.20–28 के बीच कर दी है.

 कई पार्टीज़ को इस पर भी ऐतराज होता है कि लिमिट क्यों बढ़ाई गई, लेफ्ट पार्टीज़ खासतौर पर कहती हैं कि इससे नुकसान होता है, इससे तो सिर्फ अमीर लोग ही चुनाव लड़ पाएंगे, इसलिए लिमिट तय करने का कोई साइंटीफिक फिगर नहीं है, इसलिए ये याद रखिए जितनी हायर लिमिट होगी उतना ही अमीर आदमी इलेक्शन लड़ पाएगा और गरीब आदमी इलेक्शन नहीं लड़ पाएगा.

लोकसभा 2019 चुनावों में यह आंकड़ा सामने आया है कि चुने गए 543 सदस्यों में से 233 सांसदों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं. यह 2009 के बाद से घोषित आपराधिक मामलों वाले सांसदों की संख्या में 44 प्रतिशत की वृद्धि है.
आप अंदाजा लगा सकते हैं कि देश की संसद में कितनी बड़ी मात्रा में अपराधी पहुँच रहे हैं और सभी संवैधानिक संस्थाएं सिर्फ मूक दर्शक बनी हुई हैं. इसलिए अब समय की जरूरत है कि भारतीय राजनीति में 'मसल्स और मनी' के प्रभाव को कम करने की दिशा में मजबूत कदम उठाये जाएँ ताकि लोकतंत्र को सही अर्थों में "लोगों का तंत्र" बनाया जा सके.

Hemant Singh is an academic writer with 7+ years of experience in research, teaching and content creation for competitive exams. He is a postgraduate in International
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First Published: Oct 21, 2019, 12:28 IST

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