सुचालक के प्रतिरोध को निर्धारित करने वाले कारक, अर्थ और सूत्र

May 8, 2017, 15:45 IST

विद्युत आवेश के प्रवाह में उत्पन्न बाधा को प्रतिरोध के रूप में जाना जाता है। किसी विद्युत परिपथ में विद्युतधारा के वाहक कण के रास्ते में स्थित कणों द्वारा उत्पन्न बाधा ही प्रतिरोध कहलाता है। इस लेख में सुचालक के प्रतिरोध को प्रभावित करने वाले कारक, उनके अर्थ, सूत्र आदि के बारे में अध्ययन करेंगे l

विद्युत आवेश के प्रवाह में उत्पन्न बाधा को प्रतिरोध के रूप में जाना जाता है। किसी विद्युत परिपथ में विद्युतधारा के वाहक कण के रास्ते में स्थित कणों द्वारा उत्पन्न बाधा ही प्रतिरोध कहलाता है। चूंकि विद्युतधारा के वाहक कण सीधे रास्ते के बजाय टेढ़े-मेढ़े रास्ते से गुजरते हैं और वे रास्ते में स्थित कणों से टकराते हैं, जिससे प्रतिरोध उत्पन्न होता है। किसी विद्युत परिपथ में, दोनों टर्मिनलों में संचित स्थितिज उर्जा के बीच का संभावित अंतर विद्युतधारा के प्रवाह को गति प्रदान करता है, जबकि ठीक उसी समय परिपथ में उत्पन्न प्रतिरोध विद्युतधारा के प्रवाह में गतिरोध पैदा करता हैl  अतः किसी विद्युत परिपथ में विद्युतधारा का मापन मुख्य रूप से दो कारकों पर निर्भर करता है- सुचालक के दोनों टर्मिनलों (छोरों) पर संचित स्थितिज उर्जा का संभावित अंतर और सुचालक का प्रतिरोध।

Factors affecting Resistance of a conductor
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किसी विद्युत परिपथ के प्रतिरोध को संख्यात्मक रूप में मापा जा सकता हैl विद्युतधारा को मापने के लिए SI मात्रक “ओम” का प्रयोग किया जाता है, जिसे ग्रीक अक्षर “ओमेगा” (Ω) द्वारा दर्शाया जाता हैl किसी विद्युत परिपथ में, परिपथ के दोनों टर्मिनलों (छोरों) पर संचित स्थितिज उर्जा के संभावित अंतर को परिपथ में प्रवाहित विद्युतधारा (I) से विभाजित करने पर प्रतिरोध का संख्यात्मक मान प्राप्त होता है। यह संबंध ओम के नियम द्वारा निर्धारित किया जाता है, जो बतलाता है कि किसी सुचालक के माध्यम से दो बिन्दुओं के बीच प्रवाहित विद्युतधारा दोनों बिन्दुओं पर प्राप्त वोल्टेज का समानुपाती होता है।
अर्थात, I, V के समानुपाती हैl
(दोनों टर्मिनलों पर संचित स्थितिज उर्जा का संभावित अंतर)/(प्रवाहित विद्युतधारा  ) = प्रतिरोध
अर्थात V/ I = R
अर्थात 1 ओम = 1 वोल्ट/1 एम्पीयर
या I = V/R, जहाँ R समानुपाती नियतांक अर्थात् प्रतिरोध हैl

Resistance definition
अतः जब 1 ओम प्रतिरोध वाले सुचालक को किसी ऐसे परिपथ में जोड़ा जाता है, जिसके दोनों छोरों पर संचित स्थितिज उर्जा का संभावित अंतर 1 वोल्ट है तो उस परिपथ से 1 एम्पीयर विद्युतधारा प्रवाहित होती है।

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विद्युत प्रतिरोधक क्षमता के आधार पर सभी पदार्थों को तीन समूहों के विभाजित किया जा सकता है:

(i) सुचालक: वैसे पदार्थ जिनकी विद्युत प्रतिरोधक क्षमता सबसे कम होती है। ऐसे पदार्थ विद्युत को अपने माध्यम से आसानी से प्रवाहित होने की अनुमति देते हैंl उदाहरण के लिए, चांदी, तांबा, एल्युमिनियम आदिl बिजली के तार तांबे और एल्यूमिनियम के बने होते हैं, क्योंकि उनकी विद्युत प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम होती हैl
(ii) प्रतिरोधी: वैसे पदार्थ जिनकी विद्युत प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत उच्च होती हैl मिश्रधातु, जैसे- नाइक्रोम, मैग्निन और कोन्सटेनटेन (constantan) (यूरेका) की प्रतिरोधक क्षमता उच्च होती है, इसलिए इनका इस्तेमाल विद्युत उपकरणों के निर्माण में किया जाता है। इसी वजह से एक प्रतिरोधी किसी परिपथ में विद्युतधारा के प्रवाह को कम कर देता हैl
(iii) कुचालक: वैसे पदार्थ जिनकी विद्युत प्रतिरोधक क्षमता सबसे अधिक होती हैं। ऐसे पदार्थ विद्युत को अपने माध्यम से प्रवाहित होने की अनुमति नहीं देते हैंl उदाहरण के लिए, रबड़, लकड़ी आदिl बिजली मिस्त्री, बिजली का काम करते समय रबड़ के दस्ताने पहनते हैं, क्योंकि रबड़ विद्युत का कुचालक है और उन्हें बिजली के झटके से बचाता हैl

किसी सुचालक के प्रतिरोध को प्रभावित करने वाले कारक:

किसी तार के टुकड़े या सुचालक का प्रतिरोध चार कारकों पर निर्भर करता है: तार की लंबाई, तार के अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल, तार बनाने के लिए प्रयोग की गई सामग्री की प्रतिरोधकता और सुचालक या तार का तापमानl किसी तार का प्रतिरोध उसके अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल का व्युत्क्रमानुपाती होता हैl उदाहरण के लिए, एक मोटे तांबे के तार का प्रतिरोध एक पतले तांबे के तार की अपेक्षा कम होता हैl इसके अलावा किसी तार का प्रतिरोध उसकी लंबाई के समानुपाती होता हैl उदाहरण के लिए, एक लंबे तांबे के तार का प्रतिरोध एक छोटे तांबे के तार की अपेक्षा अधिक होता हैl प्रतिरोध के व्युत्क्रम (reciprocal) को चालकत्व (conductance) कहते हैं और इसे I/R द्वारा व्यक्त किया जाता हैl चालकत्व (conductance) का SI मात्रक “mho” होता हैl समरूप अनुप्रस्थ काट वाले सुचालक के प्रतिरोध (R) और चालकत्व (G) की गणना इस प्रकार की जा सकती है:-
Factors of Resistance
जहां l सुचालक की लंबाई है, A सुचालक के अनुप्रस्थ काट का क्षेत्रफल है, σ (सिग्मा) विद्युत चालकता है और  p (rho) सुचालक की विद्युत प्रतिरोधकता है। यहाँ  प्रतिरोधकता और चालकत्व आनुपातिक स्थिरांक/नियतांक हैंl प्रतिरोधकता और चालकत्व व्युत्क्रमानुपाती हैं अर्थात
 Resistance as rho
जो पदार्थ विद्युत के अच्छे सुचालक होते हैं उनका प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम होता है जबकि कुचालकों का प्रतिरोधक क्षमता काफी उच्च होता हैl तापमान का प्रतिरोध पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है अर्थात बढ़ते तापमान के साथ प्रतिरोध भी बढता है जबकि कुछ सुचालक को अत्यंत कम तापमान पर ठंडा करने पर उनकी प्रतिरोधक क्षमता शून्य हो जाती हैl ऐसे पदार्थों को अतिचालक कहा जाता है, क्योंकि लगातार इन सुचालक के माध्यम से विद्युतधारा प्रवाहित होती रहती हैl

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प्रतिरोधियों का संयोजन

किसी परिपथ में विद्युतधारा का प्रवाह दोनों छोरों पर संचित स्थितिज उर्जा के संभावित अंतर के अलावा  परिपथ के प्रतिरोध पर निर्भर करता हैl इसलिए यह आवश्यक है कि विद्युतीय परिपथ में अपेक्षित विद्युतधारा का प्रवाह पाने के लिए दो या दो से अधिक प्रतिरोधियों को जोड़ा जाएl किसी परिपथ में प्रतिरोधियों को दो तरीके से जोड़ा जा सकता है- श्रेणीक्रम और समानांतरक्रमl अगर हम परिपथ में कुल प्रतिरोध को बढ़ाना चाहते हैं, तो प्रत्येक प्रतिरोधी को श्रेणीक्रम में जोड़ना होगा और यदि हम परिपथ में कुल प्रतिरोध को कम करना चाहते हैं, तो प्रत्येक प्रतिरोधी को समानांतरक्रम में जोड़ना होगा।
Combination of Resistance
जब दो या दो से अधिक प्रतिरोधी क्रमिक रूप से एक-दूसरे के छोरों से जुड़े होते हैं तो उन्हे श्रेणीक्रम संयोजन कहा जाता हैl दूसरी ओर जब दो या दो से अधिक प्रतिरोधी दो बिन्दुओ के बीच एक ही स्थान पर एक-दूसरे के ऊपर-नीचे जुड़े होते हैं तो उन्हे समानांतर क्रम संयोजन कहा जाता हैl
 श्रेणीक्रम संयोजन में प्रतिरोध : श्रेणीक्रम संयोजन में जुड़े सभी प्रतिरोधियों का संयुक्त प्रतिरोध अलग-अलग प्रतिरोधी के प्रतिरोध के योग के बराबर होता हैl
                         R = R1 + R2………
 Resistance in series
जब श्रेणीक्रम में कई प्रतिरोधी एक बैटरी टर्मिनल से जुड़े होते हैं, तब प्रत्येक प्रतिरोधी के दोनों (छोरों) पर संचित स्थितिज उर्जा का संभावित अंतर भिन्न-भिन्न होता है, जो प्रतिरोध के मूल्य पर निर्भर करता हैl अतः जब श्रेणीक्रम में कई प्रतिरोधी एक बैटरी टर्मिनल से जुड़े होते हैं, तब प्रत्येक प्रतिरोधी के दोनों (छोरों) पर संचित स्थितिज उर्जा के संभावित अंतर का कुल योग बैटरी पर लागू वोल्टेज के बराबर होता हैl इसके साथ ही, प्रत्येक प्रतिरोधी से प्रवाहित होने वाला विद्युतधारा पूरे परिपथ में प्रवाहित होने वाले विद्युतधारा के बराबर होता हैl
समानांतरक्रम संयोजन में प्रतिरोध : समानांतर में जुड़े सभी प्रतिरोधियों के संयुक्त प्रतिरोध का व्युत्क्रम अलग-अलग प्रतिरोधी के प्रतिरोध के व्युत्क्रम के योग के बराबर होता है।
1/R = 1/R1, 1/R2 + 1/R3...  
 Resistance in Parallel
अतः जब समानांतरक्रम में कई प्रतिरोधी जुड़े होते हैं तो उनका संयुक्त प्रतिरोध सबसे छोटे प्रतिरोधी के प्रतिरोध से कम होता हैl हमें इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि जब समानांतरक्रम में कई प्रतिरोधी जुड़े होते हैं, तो प्रत्येक प्रतिरोधी के दोनों (छोरों) पर संचित स्थितिज उर्जा का संभावित अंतर एक ही होता है, जो बैटरी पर लागू वोल्टेज के बराबर होता है। इसके अलावा समानांतरक्रम में जुड़े प्रत्येक प्रतिरोधी से प्रवाहित होने वाले विद्युतधारा का कुल योग पूरे परिपथ में प्रवाहित होने वाले विद्युतधारा के योग के बराबर होता हैl इस प्रकार, जब समानांतरक्रम में कई प्रतिरोधी जुड़े होते हैं, तब सभी प्रतिरोधियों के माध्यम से प्रवाहित होने वाले विद्युतधारा का योग पूरे परिपथ में प्रवाहित होने वाले विद्युत धारा के योग के बराबर होता हैl

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घरेलू विद्युतीकरण के लिए श्रेणीक्रम में परिपथों के संयोजन का नुकसान

घरेलू विद्युतीकरण के माध्यम से रोशनी और अन्य विभिन्न विद्युत उपकरणों के प्रयोग हेतु श्रेणीक्रम में परिपथों का संयोजन नहीं किया जाता है, क्योंकि:
 (i) अगर एक बिजली का उपकरण किसी खराबी के कारण काम करना बंद कर देता है, तो अन्य सभी उपकरण भी काम करना बंद कर देते हैंl
(ii) श्रेणीक्रम में सभी बिजली के उपकरणों का एक ही स्विच होता है, जिसके कारण उन्हें अलग-अलग बंद या चालू नहीं किया जा सकता हैl
(iii) बिजली के सभी उपकरणों को एकसमान वोल्टेज (220V) की आपूर्ति नहीं हो पाती है, क्योंकि वोल्टेज को सभी उपकरणों द्वारा साझा किया जाता हैl
(iv) बिजली के उपकरणों को श्रेणीक्रम में संयोजित करने पर परिपथ का कुल प्रतिरोध बहुत अधिक हो जाता है, जिसके कारण परिपथ में विद्युतधारा की आपूर्ति काफी कम हो जाती है।

घरेलू विद्युतीकरण के लिए समानांतरक्रम में परिपथों के संयोजन का लाभ

घरेलू विद्युतीकरण के माध्यम से रोशनी और अन्य विभिन्न विद्युत उपकरणों के प्रयोग हेतु आम तौर पर समानांतरक्रम में परिपथों का संयोजन किया जाता है, क्योंकि:
(i) अगर एक बिजली का उपकरण किसी खराबी के कारण काम करना बंद कर देता है, तो अन्य सभी उपकरण सुचारू ढ़ंग से काम करते रहते हैंl
(ii) समानांतरक्रम में प्रत्येक बिजली के उपकरण का अलग-अलग स्विच होता है, जिसके कारण अन्य उपकरणों को प्रभावित किए बिना ही उन्हें स्वतंत्र रूप से चालू या बंद किया जा सकता हैl
(iii) बिजली के सभी उपकारणों को एकसमान वोल्टेज (220V) की आपूर्ति होती है, जिसके कारण सभी उपकरण सुचारू ढ़ंग से काम करते हैंl
(iv) बिजली के उपकरणों को समानांतरक्रम में संयोजित करने पर घरेलू परिपथ का कुल प्रतिरोध बहुत कम हो जाता है, जिसके कारण परिपथ में विद्युतधारा की आपूर्ति अधिक होती हैl इसलिए प्रत्येक उपकरण अपेक्षित मात्रा में विद्युतधारा प्राप्त कर पाते हैंl

Shikha Goyal is a journalist and a content writer with 9+ years of experience. She is a Science Graduate with Post Graduate degrees in Mathematics and Mass Communication & Journalism. She has previously taught in an IAS coaching institute and was also an editor in the publishing industry. At jagranjosh.com, she creates digital content on General Knowledge. She can be reached at shikha.goyal@jagrannewmedia.com
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