भारत की अदालतों में गवाह को कसम क्यों खिलाई जाती है?

स्वतंत्र भारत में 1957 तक पवित्र किताब पर हाथ रखकर कसम खाने की प्रथा चालू थी लेकिन यह प्रथा 1969 में 'ओथ्स एक्ट, 1969' बन जाने के बाद समाप्त हुई. अब भारत की अदालतों में किसी किताब पर हाथ रखकर कसम नहीं खायी जाती है बल्कि सिर्फ एक भगवान/खुदा/ईशु/नानक को याद करते हुए शपथ दिलाई जाती है कि गवाह जो भी बोलेगा सच ही बोलेगा.
Dec 10, 2018 15:16 IST
    Oath in the Court

    हम में से लगभग सभी भारतीयों ने देखा होगा कि फिल्मों में अदालत में गवाही देने से पहले गवाह को कटघरे में खड़े होकर "गीता" पर हाथ रखकर कसम खिलाई जाती है कि वह जो कुछ कहेगा सच ही कहेगा. लेकिन आजकल सच्चाई इससे कुछ अलग है. आइये जानते हैं कि अदालतों में शपथ खाने को लेकर वर्तमान में क्या नियम है.

    अदालतों में कसम खाने का इतिहास:

    भारत में मुगलों और अन्य शासकों के शासन के दौरान धार्मिक किताबों पर हाथ रखकर शपथ लेने की प्रथा थी. हालाँकि इस समय तक यह एक दरबारी प्रथा थी इसके लिए कोई कानून नहीं था लेकिन अंग्रेजों ने इसे कानूनी जामा पहना दिया और इंडियन ओथ्स एक्ट, 1873 पास किया और सभी अदालतों में लागू कर दिया गया था.

    अदालत में कसम खाने की यह प्रथा स्वतंत्र भारत में 1957 तक कुछ शाही युग की अदालतों, जैसे बॉम्बे हाईकोर्ट में नॉन हिन्दू और नॉन मुस्लिम्स के लिए उनकी पवित्र किताब पर हाथ रखकर कसम खाने की प्रथा चालू थी.

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    भारत में किताब पर हाथ रखकर कसम खाने की यह प्रथा 1969 में समाप्त हुई. जब लॉ कमीशन ने अपनी 28वीं रिपोर्ट सौंपी तो देश में भारतीय ओथ अधिनियम, 1873 में सुधार का सुझाव दिया गया और इसके स्थान पर 'ओथ्स एक्ट, 1969' पास किया गया था. इस प्रकार पूरे देश में (जम्मू & कश्मीर) को छोड़कर एक समान शपथ कानून लागू कर दिया गया है.

    इस कानून के पास होने से भारत की अदालतों में शपथ लेने की प्रथा के स्वरुप में बदलाव किया गया है और अब शपथ एक सिर्फ एक सर्वशक्तिमान भगवान के नाम पर दिलाई जाती है.

    अर्थात अब शपथ को सेक्युलर बना दिया गया है. हिन्दू, मुस्लिम, सिख, पारसी और इसाई के लिए अब अलग-अलग किताबों और शपथों को बंद कर दिया गया है.

    अब सभी के लिए इस प्रकार की शपथ है;

    “I do swear in the name of God/solemnly affirm that what I shall state shall be the truth, the whole truth and nothing but the truth”.

    "मैं ईश्वर के नाम पर कसम खाता हूं / ईमानदारी से पुष्टि करता हूं कि जो मैं कहूंगा वह सत्य, संपूर्ण सत्य और सत्य के अलावा कुछ भी नहीं कहूँगा".

    यहाँ पर यह बताना जरूरी है कि नए ओथ एक्ट,1969' में यह भी प्रावधान है कि यदि गवाह, 12 साल से कम उम्र का है तो उसे किसी प्रकार की शपथ नहीं लेनी होनी. क्योंकि ऐसा माना जाता है कि बच्चे स्वयं भगवान के रूप होते हैं.

    गवाह को कसम क्यों खिलाई जाती है?

    जब तक किसी व्यक्ति ने शपथ नहीं खायी है तब तक वह सच बोलने के लिए बाध्य नहीं है लेकिन जैसे ही व्यक्ति ने शपथ या कसम खाली ली अब वह सच बोलने के लिए बाध्य है. इसीलिए गवाह कोर्ट में जब जज के सामने कसम खाता है (“मैं जो कहूँगा, सच कहूँगा और सच के सिवा कुछ नहीं कहूँगा") तो वह कानूनन सच बोलने के लिए बाध्य होता है. अगर अदालत ने उसका झूठ पकड़ लिया तो सजा पक्की है.

    दरअसल किसी भी मामले में गवाह दो तरीके से अपने कथन को दर्ज करा सकता है.

    1. शपथ खाकर (on oath)

    2. शपथ पत्र पर लिखकर (On Affidavit)

    अगर कोई व्यक्ति कसम खाने के बाद झूठ बोलता है तो इंडियन पैनल कोड के सेक्शन 193 के तहत यह कानून अपराध है और झूठ बोलने वाले को 7 साल की सजा दी जाएगी. इतना ही नहीं इस सेक्शन में यह प्रावधान है कि जो कोई भी गवाह किसी न्यायिक कार्यवाही के किसी मामले में झूठा प्रमाण या साक्ष्य देगा य किसी न्यायिक कार्यवाही के किसी प्रक्रम में उपयोग किये जाने हेतू झूठा साक्ष्य बनाएगा तो उसे 7 वर्ष के कारावास और जुर्माने से भी दण्डित किया जायेगा.

    आपने देखा होगा कि आप जब भी कचहरी से कोई एफिडेविट (आप इसमें शपथ लेते हो कि मैं जो कुछ लिख रहा हूँ वह सच है) बनवाते हैं तो वकील वही नाम लिख देता है जो कि आप उसको बताते हैं. वह उस नाम को वेरीफाई नहीं करता है क्योंकि उसको पता है कि आप शपथ पत्र पर कुछ भी गलत लिखवाते हो तो उसके लिए आप स्वयं जिम्मेदार होगे और जेल जाओगे.

    सारांश के तौर पर यह कहा जा सकता है कि पुराने समय में लोगों अधिक धार्मिक होते थे और धार्मिक मूल्यों के बहुत अधिक महत्व देते थे इसलिए राजाओं और अंग्रेजों ने भारतीयों की धार्मिक आस्था का उपयोग लोगों से सच उगलवाने में किया ताकि समाज में अपराध कम हों और अपराधी को पकड़कर दण्डित किया जा सके.

    भारतीय कानून में गीता, कुरान या किसी भी धार्मिक किताब का कोई उल्लेख नहीं है. दरअसल भारत की फिल्मों में अभी भी पुराने समय की प्रथा को दिखाया जाता है जिसमें गवाह को गीता या कुरान पर हाथ रखकर कसम खानी होती है लेकिन भारत की अदालतों में यह प्रथा प्रचलन में नहीं है.

    यह बात तो आप आसानी से समझ सकते हैं कि यदि लोग गीता या कुरान पर आज भी हाथ रखकर सच बोल रहे होते तो भारत की अदालतों में 3.3 करोड़ से अधिक केस लंबित नहीं होते.

    अतः वर्तमान समय में भारत की अदालतों में गीता या कुरान जैसी ना तो कोई पवित्र पुस्तक मौजूद है और ना ही किसी किताब पर हाथ रखकर कसम खिलायी जाती है बल्कि अदालतों के अंदर, भारतीय संविधान ही एकमात्र पवित्र पुस्तक है.

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