क्या आप जानते हैं साड़ी की उत्पत्ति भारत में नहीं हुयी है?

Aug 21, 2018, 17:15 IST

किसी भी देश की पहचान उसकी भौगोलिक स्थिति, जनसंख्या, राजनीतिक व्यवस्था, नृजातीयता (Ethnicity) एवं सांस्कृतिक परिवेश से होती है। इन सभी पहचान के तत्वों के साथ साथ भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान के लिए विशेष रूप से विश्वपटल पर जाना जाता है। इस लेख में ऐतिहासिक तथ्यों के माध्यम से इस सत्य सी प्रतीत मान्यता पर पड़ी परतों को हटाकर आप तक साड़ी की वास्तिविक उत्पत्ति कहाँ हुई इसकी जानकारी देने का प्रयास किया हैं।

Origin of the Saree HN
Origin of the Saree HN

किसी भी देश की पहचान उसकी भौगोलिक स्थिति, जनसंख्या, राजनीतिक व्यवस्था, नृजातीयता (Ethnicity) एवं सांस्कृतिक परिवेश से होती है। इन सभी पहचान के तत्वों के साथ साथ भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान के लिए विशेष रूप से विश्वपटल पर जाना जाता है। सांस्कृतिक पहचान में विशेषकर यहाँ की वेशभूषा अपना एक अलग ही पहचान रखती है।

वेशभूषा में अधिकांश लोग साड़ी को भी भारतीय संस्कृति से जोड़ते हुए गर्व महसूस करते हैं। परन्तु अगर ऐतिहासिक तथ्यों की पड़ताल करें तो सत्य कुछ और निकलता प्रतीत होता हैं। चलिए आज हम इस लेख में ऐतिहासिक तथ्यों के माध्यम से इस सत्य सी प्रतीत मान्यता पर पड़ी परतों को हटाकर आप तक साड़ी की वास्तिविक उत्पत्ति कहाँ हुई इसकी जानकारी देने का प्रयास करते हैं।  

हम जब भी साड़ी पहने किसी भी महिला को देखते हैं तो हम उसे भारतीयता से जोड़ देते हैं। ऐसा आखिर करें भी क्यों न हम क्योंकि यह परिधान हमारे देश में राष्ट्रीय पोशाक से कुछ कम नही माना जाता है। साड़ी भारतीय स्त्रियों का मुख्य परिधान है। चाहे करवा चौथ, चाहे तीज या फिर अन्य किसी सांस्कृतिक उत्सवों पर सजना संवरना हो तो बिना साड़ी के मानो महिलाओं का श्रृंगार ही पूरा नही होता।

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साड़ी के साहित्यिक साक्ष्य

संस्कृत के अनुसार साड़ी का शाब्दिक अर्थ होता है 'कपड़े की पट्टी' जातक नामक बौद्ध साहित्य में प्राचीन भारत के महिलाओं के वस्त्र को ‘सत्तिका’ शब्द से वर्णित किया गया है। चोली का विकास प्राचीन शब्द ‘स्तानापत्ता’ से हुआ है जिसको मादा शरीर से संदर्भित किया जाता था। 

कल्हण द्वारा रचित राजतरंगिनी के अनुसार कश्मीर के शाही आदेश के तहत दक्कन में चोली प्रचलित हुआ था। बानभट्टा द्वारा रचित कदंबरी और प्राचीन तमिल कविता सिलप्पाधिकरम में भी साड़ी पहने महिलाओं का वर्णन किया गया है।

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साड़ी की उत्पत्ति

कुछ इतिहासकारों का मानना है की कपड़े बुनाई की कला 2800-1800 ईसा पूर्व के दौरान मेसोपोटामियन सभ्यता से भारत आई थी। वैसे तो समकालीन सिंधु घाटी सभ्यता सूती कपड़े से परिचित थे और वस्त्र के रूप में लंगोट जैसा कपड़े का इस्तेमाल करते थे क्योंकि पुरातात्विक सर्वेक्षण के दौरान कपास के कुछ अवशेष, सिंध से प्राप्त हुये हैं लेकिन बुनाई की कला का साक्ष्य अब तक नहीं मिला है।

1500 ईसा पूर्व के बाद जब भारत में आर्यों का आगमन हुआ तो पहली बार उन्होंने ही वस्त्र शब्द का इस्तेमाल किया था जिसका अर्थ उनके लिए पहनने योग्य चमड़े का एक टुकड़ा था।

समय के साथ, कमर के चारों ओर कपड़े की लंबाई पहनने की यह शैली, खासतौर से महिलाओं के लिए, और कपड़ा खुद को नीवी के रूप में जाना जाने लगा। इसलिए, हम यह कह सकते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता की महिलाओं द्वारा पहना गया साधारण लंगोट जैसा कपड़ा भारत की कई शानदार साड़ी का प्रारंभिक अग्रदूत था।

उसके बाद मौर्य से लेकर सुंग तक और फिर मुग़ल काल से ब्रिटिश काल तक साड़ियों के पहनने के तौर तरीके में बदलाव आया है जैसे-  मौर्य और सुंग काल में आयताकार साड़ी नुमा कपड़ा इस्तेमाल हुआ करता था जो केवल महिलाओ के शरीर के निचले भाग को ही ढंकता था; उसके बाद धीरे- धीरे परिधान की लम्बाई बढती गयी; और फिर मुग़ल काल में एक क्रांतिकारी बदलाव हुए जैसे सिलाई की कला से इस परिधान को परिपूर्ण कर दिया गया।

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तरह-तरह की साड़ियाँ और पहनने के तरीके

साड़ी पहनने के कई तरीके हैं जो भौगोलिक स्थिति और पारंपरिक मूल्यों और रुचियों पर निर्भर करता है। अलग-अलग शैली की साड़ियों में कांजीवरम साड़ी, बनारसी साड़ी, पटोला साड़ी और हकोबा मुख्य हैं।

मध्य प्रदेश की चंदेरी, महेश्वरी, मधुबनी छपाई, असम की मूंगा रेशम, उड़ीसा की बोमकई, राजस्थान की बंधेज, गुजरात की गठोडा, पटौला, बिहार की टस्सर, काथा, छत्तीसगढ़ी कोसा रेशम, दिल्ली की रेशमी साड़ियां, झारखंडी कोसा रेशम, महाराष्ट्र की पैथानी, तमिलनाडु की कांजीवरम, बनारसी साड़ियां, उत्तर प्रदेश की तांची, जामदानी, जामवर एवं पश्चिम बंगाल की बालूछरी एवं कांथा टंगैल आदि प्रसिद्ध साड़ियाँ हैं।

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