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जानें को-ऑपरेटिव बैंकों के रिज़र्व बैंक के दायरे में आने से क्या बदल जायेगा?

देश में कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्र के लिए साख-सुविधाएं उपलब्ध कराने वाले सहकारी बैंकों की स्थापना “राज्य सहकारी समिति अधिनियम के अनुसार की जाती है जबकि इनका पंजीकरण “रजिस्ट्रार ऑफ को-ऑपरेटिव सोसाइटी के पास किया जाता है. वर्तमान में 1540 को-ऑपरेटिव बैंकों में क़रीब 8.6 करोड़ जमाकर्ताओं के 4 लाख करोड़ 84 लाख रुपए जमा हैं.
Jun 25, 2020 15:33 IST
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Co-operative Banks in India
Co-operative Banks in India

पिछले कुछ सालों से भारत में बैंकों की वित्तीय हालात काफी गिर गयी है. कई घोटाले सामने आ चुके हैं जैसे पंजाब और महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक, यस बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, शिम्भोली सुगर मिल्स बैंक स्कैम इत्यादि. 

इन्हीं घटनाओं को देखते हुए भारत सरकार ने जून 2020 में अध्यादेश पास किया है कि अब देश के सभी सहकारी या को-ऑपरेटिव बैंकों को रिज़र्व बैंक के दायरे में लाया जाए. 

आइये इस लेख में जानते हैं कि आखिर ये को-ऑपरेटिव बैंक क्या होते हैं वर्तमान में इनकी निगरानी कौन करता है और इनको रिज़र्व बैंक की निगरानी में रखने से क्या क्या बदल जायेगा? 

को-ऑपरेटिव किसे कहा जाता है? (What is Co-Operative Bank)

देश में कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्र के लिए साख-सुविधाएं उपलब्ध कराने वाले सहकारी बैंकों की स्थापना “राज्य सहकारी समिति अधिनियम" के अनुसार की जाती है जबकि इनका  पंजीकरण “रजिस्ट्रार ऑफ को-ऑपरेटिव सोसाइटी" के पास किया जाता है. अब अध्यादेश पारित होने के बाद सभी को-ऑपरेटिव, रिज़र्व बैंक की निगरानी में आ जायेंगे.

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वर्तमान में देश में 1482 शहरी को-ऑपरेटिव बैंक हैं, जबकि 58 मल्टी स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक हैं. इन 1540 बैंकों में क़रीब 8.6 करोड़ जमाकर्ताओं के 4 लाख करोड़ 84 लाख रुपए जमा हैं.

को-ऑपरेटिव बैंकों के उद्येश्य (Objectives of Cooperative Banks)

इन सहकारी बैंकों की स्थापना का मुख्य उद्देश्य कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ऋण सुविधा प्रदान करना है. इन बैंकों को मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों में खोला जाता है. इसके अलावा ये बैंक, देश में वित्तीय समावेशन सुनिश्चित करने में भी सहायक हैं.

को-ऑपरेटिव बैंकों के प्रकार (Types of Co-Operative Banks)

भारत में सहकारी बैंकों के निम्न प्रकार हैं;

(1) प्राथमिक सहकरी साख समितियां:- इनकी स्थापना गावों, नगर या कस्बों में होती है जो कि किसानों, कारीगर मजदूर या दुकानदार को ऋण देतीं हैं.

(2) केन्द्रीय अथवा जिला सहकारी बैंक:- इसका कार्यक्षेत्र संबंधित जिला होता है.

(3) राज्य सहकरी बैंक:- यह सहकारी साख संगठन की सर्वोच्च संस्था है.यह, राज्य भर में फैले हुए समस्त केंद्रीय बैंकों को संगठित करता है.

(4) भूमि विकास बैंक:- ये बैंक किसानों को उनकी भूमि बंधक रखकर 'कृषि विकास कार्यक्रमों' के लिए दीर्घकालीन ऋण प्रदान करते हैं.
ऑपरेटिव बैंक अब रिज़र्व बैंक के दायरे में:

वर्तमान में को-ऑपरेटिव बैंकों की निगरानी को-ऑपरेटिव सोसाइटी करती है लेकिन अब यह काम रिज़र्व बैंक को दे दिया जायेगा जैसे कि बाक़ी सरकारी और प्राइवेट बैंकों की निगरानी की जाती है. इससे निम्न फायदे होंगे;

1. इस हस्तांतरण का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जनता में यह सन्देश जायेगा कि उनका पैसा सुरक्षित है. 

2. रिज़र्व बैंक यह सुनिश्चित करेगा कि को-ऑपरेटिव बैंकों का पैसा किस क्षेत्र के लिए आवंटित किया जाना चाहिए. इसे प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग भी कहा जाता है.

3.को-ऑपरेटिव बैंकों को अपनी कुल जमा का एक निश्चित प्रतिशत रिज़र्व बैंक के पास रखना होगा जिससे कि इस बैंक के खाता धारकों इस बात की तसल्ली होगी कि उनका पैसा रिज़र्व बैंक की निगरानी में होने के कारण सुरक्षित है.

4. इन बैंकों के रिज़र्व बैंक के अधीन आने पर इसे रिज़र्व बैंक के नियमों को मानना होगा जिससे देश की मौद्रिक नीति को सफल बनाने में आसानी होगी.

उम्मीद है कि सरकार के इस फैसले से जनता का विश्वास देश के को-ऑपरेटिव बैंकों में और बढेगा और देश में बैंकों की वित्तीय हालात ठीक होने के आसार बढ़ंगे.

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