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भारत के सर्वश्रेष्ट्र आईएएस आईपीएस अफसर: अजीत डोभाल से जुड़े 16 रोचक तथ्य

Oct 18, 2016 16:06 IST
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Ajit-Doval-IAS

जम्मू कश्मीर के उड़ी में आर्मी मुख्यालय पर किए गए आतंकी हमले के जवाब में जब भारतीय सेना ने नियंत्रण रेखा के पार जाकर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया है तब से हर भारतीय आतंकवाद के खिलाफ सक्रिय कार्रवाई के लिए भारतीय सेना और मोदी सरकार की जमकर सराहना कर रहे हैं। हालांकि, हर कोई अपनी- अपनी तरफ से इसका श्रेय भी ले रहा है, लेकिन एक शख्स ऐसा है जिसने पर्दे के पीछे से अपने काम को बखूबी से अंजाम दिया। इस शख्स ने पर्दे के पीछे रहकर न केवल इस पूरे सर्जिकल ऑपरेशन की पटकथा लिखी बल्कि इसका संचालन कर इसे कामयाब भी बनाया और राजनीतिक या कूटनीतिक स्तर, दोनों मोर्चों पर इसे सफल बनाया। जी हां, हम बात कर रहे हैं भारत के शीर्ष जासूस और शीर्ष रणनीतिकार तथा वर्तमान में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार श्री अजीत डोभाल के बारे में ।

1. व्यक्तिगत पृष्ठभूमि

डोभाल का जन्म 1945 में उत्तराखंड के पौड़ी गढवाल जिले के घिरी बानेलस्यूं मे हुआ था। उनके पिता ने भी भारतीय सेना में सेवा की है और इसलिए उनकी परवरिश भी सेना वाली माहौल में ही हुआ है ।

2. शैक्षिक पृष्ठभूमि

जैसा कि ऊपर बताया गया है कि अजित डोभाल सैन्य पृष्ठभूमि से थे. इसलिए उनकी प्राथमिक शिक्षा  भी राजस्थान के अजमेर स्थित अजमेर मिलिट्री स्कूल (पूर्व में किंग जॉर्ज रॉयल इंडियन मिलिट्री स्कूल) से हुई थी। आगे की उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए उन्होंने 1967 में आगरा विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और पहली रैंक के साथ अर्थशास्त्र में अपनी मास्टर डिग्री पूरी की।

3. पेशेवर पृष्ठभूमि

अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद श्री डोभाल ने सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी की और आसानी से इसमें सफलता भी हासिल कर ली। उन्होंने आईपीएस के माध्यम से देश की सेवा करने का विकल्प चुना। 1968 में श्री डोभाल को एक आईपीएस अधिकारी के रूप में केरल कैडर में शामिल किया गया था।

4. सराहनीय सेवा के लिए पुलिस पदक

एक अधिकार क्षेत्र में रहकर उन्होंने अपने बेहतरीन प्रयासों की बदौलत कानून और व्यवस्था की स्थिति को सुनिश्चित किया। अपने इस अनुकरणीय सेवा रिकॉर्ड के फलस्वरूप अजीत डोभाल को उनके सराहनीय सेवा के लिए पुलिस पदक से सम्मानित किया गया। इस सम्मान को हासिल करने के लिए 17 साल की सर्विस जरूरी होती है, लेकिन श्री डोभाल की बेहतरीन सेवा के कारण उन्हें अपनी सर्विस के 6 साल के दौरान ही यह सम्मान प्रदान किया गया। अपनी सराहनीय सेवा एवं काम के लिए पुलिस पदक पाने वाले अब तक के सबसे कम उम्र के पुलिस अधिकारी हैं।

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5. पूर्वोत्तर में विद्रोह

अजीत डोभाल को अपने करियर में पहली बड़ी उपलब्धि 1980 के दशक के दौरान तब प्राप्त हुई थी जब उन्हें पूर्वोत्तर में एक मध्यम स्तर का खुफिया अधिकारी और अंडरकवर एजेंट नियुक्त किया गया था। 1986 में पूर्वोत्तर भारत, खासकर मिजोरम अलगाववादी विद्रोह की समस्या से पीड़ित था। मिजो नेशनल फ्रंट ने भारत के खिलाफ विरोधी अभियान छेड़ दिया था। इस दौरान अजित डोभाल संगठन ने इस फ्रंट में सेंधमारी की और भारतीय हितों के लिए लालडेंगा शीर्ष 7 कमांडरों को भारत के पक्ष में कर लिया। इससे उन्होंने अलगाववादी एमएनएफ आंदोलन की कमर तोड़ दी और उन्हें वापस बातचीत और शांति की प्रक्रिया में शामिल करा लिया। सरकारी तंत्र में कई लोगों का कहना है कि 1986 में हुए मिजो समझौते का श्रेय भी श्री डोभाल को ही जाता है।

6- ऑपरेशन ब्लैक थंडर

उत्तर-पूर्व में आतंकवाद विरोधी कार्रवाइयों में अपनी दक्षता साबित करने के बाद उन्हें पंजाब में आतंकवाद विरोधी आपरेशन का पक्षकार बनाया गया। 1988 के दौरान जब पंजाब में खालिस्तान आंदोलन अपने चरम पर था तो सरकार ने श्री डोभाल को एक बार फिर से एक गुप्त एजेंट के रूप में नियुक्त किया। उन्होंने स्वयं को एक रिक्शा चालक के रूप में रखा और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के एक एजेंट के रूप में खालिस्तानी आतंकवादियों से संपर्क किया। उन्होंने खालिस्तानियों को इस बात के लिए कनविंस कर लिया कि वह उनके हितैषी हैं और इसी कारण उन्हें स्वर्ण मंदिर के महत्वपूर्ण भागों में आसानी से घुसने का मौका मिल गया जो उस समय पूरी तरह से सील था। वहां से उन्होंने अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारी और खुफिया जानकारी, जैसे- आतंकियों की संख्या, ताकत, आतंकवादियों के हथियार की जानकारी जैसी कई महत्वपूर्ण इनपुट्स एकत्र कर लिए।

यही जानकारियां ऑपरेशन ब्लैक थंडर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुई जिसे 30 अप्रैल 1986 को अंजाम दिया गया था। डोभाल द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी की मदद से 300 एनएसजी कमांडो और 700 बीएसएफ के जवानों ने सिक्खों के पवित्र तीर्थ स्वर्ण मंदिर पर धावा बोल कर कब्जा कर लिया। इस दौरान वहां से लगभग 300 सिख उग्रवादियों को पकड़ा गया।

7. कीर्ति चक्र

उत्तर-पूर्वी राज्यों में उनके योगदान से इस क्षेत्र में उग्रवाद का सफाया करने में मदद मिली थी। खालिस्तान आतंकवाद को खत्म करने में उनके द्वारा दिए गए योगदान से उनके कारनामे सरकार बाबुओं, खुफिया समुदाय के बीच मशहूर हो गए, यहां तक कि सैन्य हलकों में उन्हें मान-सम्मान और ख्याति अर्जित हुई। 1988 में अजीत डोभाल को भारत के सर्वोच्च वीरता पुरस्कारों में से एक कीर्ति चक्र से नवाजा गया। इस पुरस्कार के बारे में सबसे दिलचस्प तथ्य यह था कि इससे पहले यह पुरस्कार केवल सैन्य सम्मान के रूप में दिया जाता था, लेकिन डोभाल ने अपने जुनून और देश सेवा की प्रतिबद्धता से इसे बदल दिया। अजीत डोभाल ऐसे पहले पुलिस अधिकारी बनें जिन्हें कीर्ति चक्र से नवाजा गया था।

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8. पाकिस्तान में खुफिया जासूस

हालांकि, इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन सरकार के आधिकारिक सूत्रों के अनुसार मिली जानकारी से यह पता चलता है कि अजीत डोभाल ने पाकिस्तान में एक गुप्त एजेंट के रूप में कार्य किया था। वह  पाकिस्तान में 7 साल तक अंडरकवर एजेंट रहें । इस दौरान वो कई उच्च जोखिम वाले ऑपरेशन में शामिल रहें और इस माध्यम से वो भारत सरकार के लिए महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी एकत्र करते थे। राजस्थान से होने के कारण उनकी बोलचाल पाकिस्तानी माहौल के अनुरूप थी और इसी कारण पाकिस्तान में रहने के दौरान उन्होंने आसानी से स्वयं को पाकिस्तानी बस्तियों के अनुरूप ढ़ाल लिया और वहां का स्थानीय नागरिक बनकर अपने कार्य को अंजाम दिया।

9. कश्मीर में आतंकवाद विरोधी आपरेशनों को अंजाम दिया

90 के दशक के मध्य के दौरान कश्मीर में आतंकवाद आंदोलन तेजी से फैल रहा था और सरकार को हालात अपने पक्ष में करने के लिए एक स्थिर हाथ की जरूरत थी जो हालातों को उसके पक्ष में बदल सके। संवेदनशील स्थिति को ध्यान में रखकर सरकार को इस मुसीबत में अपने विश्ववसनीय अधिकारी अजीत डोभाल की याद आई। कश्मीर ऑपरेशन के दौरान उनके खाते में सबसे बड़ी सफलता तब आई जब उन्होंने खूंखार कश्मीरी आतंकवादी कश्मीरी कूका पैरी को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर कर दिया। डोभाल ने पैरी और उसके संगठन इखवान-ए-मुसलिमून के कमांडरों को भारत सरकार के पक्ष में लाने के लिए राजी कर लिया। शीर्ष सैन्य कमांडरों ने विद्रोहियों को अपने साथ मिला लिया जिसके बाद उन्होंने भारतीय सेना की मदद करने के अलावा सुरक्षा एजेंसियों की भी मदद की और इससे सेना को कश्मीर में आतंकवाद की कमर तोड़ने में मदद मिली।

कश्मीर में कानून और व्यवस्था की स्थिति सुनिश्चित करने के अलावा यह आपरेशन एक राजनीतिक सफलता भी था, जिसके कारण सरकार 1996 में शांतिपूर्ण तरीके से चुनावों का संचालन किया जा सका। डोभाल के कश्मीर कार्यकाल के दौरान उन्हें भारत के शीर्ष जासूस के अलावा मास्टर रणनीतिकार का उपनाम भी मिला।

10. एयर इंडिया का विमान अपहरण

हम सभी इस बारे में जानते हैं कि 1999 में काबुल में आतंकियों ने इंडियन एयरलाइंस के विमान आईसी 814 का अपहरण कर लिया था। शायद बहुत कम लोग जानते होंगे कि सभी यात्रियों की सुरक्षित वापसी कराने के लिए आतंकियों से बातचीत करने में अजीत डोभाल ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस के अलावा यह भी माना जाता है कि डोभाल ने ही 1971 से लेकर 1999 तक लगभग एयर इंडिया के 15 विमानों को अपहरण होने से बचाया था।  हालांकि यह भले ही स्वयं की पीठ थपथपाने वाली बात लगती हो लेकिन डोभाल ने वाकई में इस काम को अंजाम दिया।

11. खुफिया ब्यूरो में "बाबू" कल्चर को खत्म किया

खुफिया ब्यूरो के साथ अपने लंबे और शानदार करियर के दौरान उन्होंने यह कर के दिखाया कि उनहें सभी चुनौतियों से निपटने में महारत हासिल है। यहां तक कि उन्हे आईबी और रॉ में एक ऐसे अधिकारी के रूप में जाना जाता है जिन्होंने लालफीताशाही पर हावी होकर 'बाबू' कल्चर को खत्म किया। डोभाल के तहत कार्य करने वाले खुफिया अधिकारियों और एजेंटो को अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए पूरी छूट मिली हुई थी। 

डोभाल ने महत्वपूर्ण ऑपरेशनों को अंजाम देने के लिए अपने अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से प्रशिक्षित करने के साथ-साथ संचालन भी किया और यहां तक कि उन्हें इस बात के लिए प्रेरित किया कि वे कार्य को अंजाम देने के लिए उस करैक्टर में ढल जाएं जो उन्हें दिया गया है और यह भी निर्देश दिया कि वो सामान्य कार्यालय समय के दौरान भी उस शैली का प्रयोग करें जो उन्हें दी गयी है। इस क्षेत्र से आने के कारण डोभाल यह बात अच्छी तरह जानते थे कि किस एजेंट्स को किस तरह कठिनाइयों का सामना करने के साथ साथ कई कुर्बानियां भी देनी पड़ती हैं। उन्होंने यह सुनिश्चत किया कि एजेंट्स को और अधिक रियायतें देकर उनकी जिंदगी और अधिक आरामदायक और सरल बनाया जाय ।

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12. स्पाईमास्टर (जासूस)

यह 2005 की बात है जब अजीत डोभाल ने आधिकारिक तौर पर यह स्वीकार किया था कि उन्होंने भारत के शीर्ष जासूस के रूप में कार्य किया था। उन्होंने एक दशक से भी अधिक समय तक भारत के खुफिया ब्यूरो के प्रमुख के रूप में सेवा की और कई खुफिया ऑपरेशनों को अंजाम दिया। 2004-05 के अंत में उन्हें खुफिया ब्यूरो का निदेशक चुना गया और अंतत: 2005 में वो सेवानिवृत्त हुए ।

13. दाऊद इब्राहिम को पकड़ने में विफल रहें

यहां तक कि रिटायर होने के बाद भी वह जासूस के रूप में सक्रिय रहें । यह माना जाता है कि अजीत डोभाल देश के लिए किए गए कई गुप्त आपरेशनों  में शामिल रहें थे। ऐसा ही एक ऑपरेशन था जो उन्होंने भारत के सबसे वांछित शख्स दाऊद इब्राहिम को पकड़ने के लिए शुरू किया गया था। हालांकि, अपुष्ट रिपोर्टों के अनुसार मुंबई पुलिस के एक भेदिये ने इस ऑपरेशन के तमाम जानकारियों के बारे में पाकिस्तानी अधिकारियों को जानकारी दे दी थी और इससे पहले ऑपरेशन शुरू हो पाता कि अंडरवर्ल्ड डॉन सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जा चुका था। यदि आप एक बॉलीवुड प्रशंसक रहे हैं, तो आपको अंडरवर्ल्ड डॉन के रूप में अर्जुन रामपाल, इरफान खान और ऋषि कपूर अभिनीत फिल्म डी डे याद रखना चाहिए। यह फिल्म इसी ऑपरेशन की विफलता से प्रेरित है।

14- विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन के संस्थापक

2005 में रिटायर होने के बाद डोभाल ने विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन की स्थापना की जो विवेकानंद केंद्र के अधीन एक पब्लिक पॉलिसी थिंक टैंक है। अजीत डोभाल को विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन का निदेशक नियुक्त किया गया। यह केंद्र सार्वजनिक नीति (पब्लिक पॉलिसी) से संबंधित विभिन्न विषयों पर अनुसंधान करता है, जिसमें शामिल हैं:

  • प्रशासन और राजनीतिक अध्ययन
  • पड़ोसी देशों का अध्ययन
  • राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक अध्ययन
  • ऐतिहासिक और सभ्यता अध्ययन
  • आर्थिक अध्ययन
  • अंतरराष्ट्रीय संबंध और कूटनीति
  • तकनीकी और वैज्ञानिक अध्ययन
  • मीडिया स्टडीज

15. 5वें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में नियुक्त

2014 के आम चुनावों के बाद 30 मई 2014 को मोदी सरकार द्वारा शपथ लेने के बाद अजीत डोभाल को देश का 5वां राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया गया। तब से वह देश की सुरक्षा के बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में उनकी सुरक्षा रणनीति के बारे में अगर बात की जाए तो उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को सूचीबद्ध किया है, जिसका वर्णन नीचे दिया जा रहा है:

  • देश की सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया तंत्र में सुधार कर दोनों के बीच समन्वय को बेहतर बनाना।
  • नौकरशाही व्यवस्था से दूर रहना और सीमापार आतंकवाद का सामना कर रहे अधिकार क्षेत्रों में सुरक्षा एजेंसियों को पूरी छूट देना।
  • पाकिस्तान और भारत में आतंकवाद फैलाने वाले देशों के साथ निपटने के लिए कठोर नीति की स्थापना।
  • जिला और स्थानीय स्तर पर मानवीय खुफिया तंत्र को मजबूत बनाना।
  • राष्ट्रीय खुफिया ग्रिड का निर्माण और शुरूआत।
  • समान नक्सल विरोधी नीति विकसित करना ।

16- इराक में आईएसआईएस के चंगुल से भारतीय नर्सों की सकुशल स्वदेश वापसी

देश का पांचवा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नियुक्त होने के बाद डोभाल के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती थी। जून 2014 में युद्ध प्रभावित इराक मे फंसी 45 भारतीय नर्सों की सकुशल स्वदेश वापसी में डोभाल की महती भूमिका रही। इन नर्सों को मानवीय सहायता के लिए एक विशेष कार्यक्रम के तहत यहां तैनात किया गया और बाद में ये तिकरित के एक अस्पताल में फंस गयी थीं जिसके बाद इन्हें आईएसआईएस मोसुल ने बंधक बना लिया था। एक संचालक  होने के नाते डोभाल ने व्यक्तिगत रूप से इराक के लिए एक गुप्त मिशन पर उड़ान भरी और नर्सों की भारत के लिए सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की।

अजीत डोभाल के बारे में ये कुछ ऐसी जानकारियां हैं जो सार्वजिनक मंचों पर उपलब्ध हैं। यदि आपके पास ऐसी कोई जानकारी है जो हम इस लेख में शामिल नहीं कर पाएं हैं तो उनकी सूची बना लें और नीचे दिए गए कॉमेंट सेक्शन में उनका उल्लेख करें।

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